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बेंगलुरु में कुदरत का कहर 7 मौतें पानी में डूबीं 5000 किताबें क्या गार्डन सिटी बन गया है कंक्रीट का जंगल ?

बेंगलुरु में कुदरत का कहर 7 मौतें पानी में डूबीं 5000 किताबें  क्या गार्डन सिटी बन गया है कंक्रीट का जंगल ?

भीषण गर्मी के बाद अचानक आई तबाही

बेंगलुरु में पिछले कुछ हफ्तों से चल रही भीषण हीटवेव (Heatwave) के बाद, शहर के लोगों को उम्मीद थी कि थोड़ी बारिश राहत लाएगी। लेकिन बुधवार की शाम जो हुआ, वह किसी डरावने सपने से कम नहीं था। एक घंटे से भी कम समय में आए 'क्लाउडबर्स्ट' (बादल फटने जैसी) जैसी तेज बारिश ने पूरे सेंट्रल बिजनेस डिस्ट्रिक्ट (CBD) को तहस-नहस कर दिया। 78 मिमी की अचानक हुई इस बारिश ने दिखा दिया कि 'सिलिकॉन वैली' कहे जाने वाले शहर का बुनियादी ढांचा कितना कमजोर है। यह सिर्फ बारिश नहीं थी, बल्कि शहर के लिए एक खौफनाक वेक-अप कॉल है।

अस्पताल की दीवार ढही  7 मासूमों ने गंवाई अपनी जान

इस प्राकृतिक आपदा में सबसे दर्दनाक और दिल दहला देने वाला हादसा एक स्थानीय अस्पताल में हुआ। बारिश और 50 किमी/घंटे की रफ्तार से चल रही तेज हवाओं के दबाव से अस्पताल की एक दीवार गिर गई। इसकी चपेट में आने से 7 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई और 9 लोग गंभीर रूप से घायल हैं। यह हादसा चीख-चीख कर बता रहा है कि हमारी पुरानी इमारतें और कमजोर निर्माण बारिश के इस झटके को झेलने के लायक भी नहीं हैं। जिन परिवारों ने अपने अपनों को खोया है, उनके लिए यह बारिश जीवन भर का नासूर बन गई है।

 5000 किताबें और एक बुकस्टोर ओनर का सपना पानी में बहा

बेंगलुरु की एक खास पहचान इसके आइकॉनिक बुकस्टोर्स से भी है। चर्च स्ट्रीट पर स्थित एक मशहूर बुकशॉप में जब बारिश का गंदा पानी घुसा, तो मंजर रुला देने वाला था। लगभग 5,000 नई और दुर्लभ किताबें मिनटों में पानी में तैरने लगीं। ओनर के मुताबिक, सिर्फ 30 मिनट में सब कुछ खत्म हो गया। यह सिर्फ एक वित्तीय नुकसान नहीं है, बल्कि शहर की सांस्कृतिक विरासत (Cultural Heritage) पर एक बड़ा प्रहार है। एक व्यक्ति की सालों की मेहनत, उसका सपना, अब सिर्फ भीगा हुआ कचरा बन चुका है।

 अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट (Urban Heat Island) क्यों आई ऐसी अचानक प्रलय ? 

आखिर अचानक इतनी भयानक बारिश क्यों हुई? क्लाइमेट एक्सपर्ट्स के अनुसार, बेंगलुरु में यह अचानक आया क्लाउडबर्स्ट 'अर्बन हीट आइलैंड' इफेक्ट का सीधा नतीजा हो सकता है। शहर में अंधाधुंध कंक्रीट के निर्माण के कारण जब ज़मीन का तापमान हद से ज्यादा बढ़ जाता है, तो वह ऊपर की ठंडी हवा के साथ मिलकर 'लोकल इंटेंस कन्वेक्शन'

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 (Localized Intense Convection) बनाता है। यही वजह है कि सेंट्रल एरिया में 78mm बारिश हुई, जबकि शहर के बाहरी इलाकों में मौसम शांत था। यह एक खतरनाक ट्रेंड है, जिस पर अगर अभी ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में और भी भयानक परिणाम भुगतने होंगे।

स्पंज सिटी (Sponge City) का फेलियर ड्रेनेज सिस्टम की खुली पोल

हर साल करोड़ों रुपये ड्रेनेज के रखरखाव पर खर्च होते हैं, लेकिन 1 घंटे की बारिश ने इस भ्रष्ट सिस्टम की पोल खोल दी। एमजी रोड, इंदिरानगर और कोरमंगला जैसे पॉश इलाके 2 से 3 फीट पानी में डूब गए। इसका सबसे बड़ा कारण है शहर की 'नेचुरल वैलीज़' और 'स्टॉर्मवॉटर ड्रेंस' (Rajakaluves) पर हुआ अवैध निर्माण। जब तक बेंगलुरु 'स्पंज सिटी' (ऐसा शहर जो बारिश के पानी को सोख सके) के कॉन्सेप्ट को नहीं अपनाएगा, तब तक हर मॉनसून में ऐसी ही तबाही देखने को मिलेगी। पानी को बहने का रास्ता नहीं मिलेगा, तो वह हमारे घरों और दफ्तरों में ही घुसेगा।

 ट्रैफिक का तांडव जब मेट्रो स्टेशन और सड़कें बन गईं तालाब

शाम के पीक आवर्स (Peak Hours) में आई इस बारिश ने शहर के ट्रांसपोर्ट सिस्टम को पूरी तरह कोलैप्स कर दिया। 50 किमी/घंटे की तूफानी हवाओं ने 170 से ज्यादा पेड़ और 400 से ज्यादा शाखाएं उखाड़ फेंकी। सिल्क बोर्ड और दक्षिणी मेट्रो स्टेशनों के बाहर पानी भरने से लोग घंटों फंसे रहे। कई लोगों को तो अपने ऑफिस से घर पहुंचने में 6-7 घंटे लग गए। लोग अपनी गाड़ियों में बेबस बैठे थे, और बाहर पानी का स्तर लगातार बढ़ रहा था।

 पावर ग्रिड फेलियर 300 मेगावाट की गिरावट और अंधेरे में डूबा शहर

जैसे ही तबाही शुरू हुई, शहर का पावर इंफ्रास्ट्रक्चर ताश के पत्तों की तरह ढह गया। इनकमिंग पावर लाइन्स को हुए भारी नुकसान के कारण बिजली की खपत में 300 मेगावाट की भारी गिरावट दर्ज की गई। आधी रात तक कई इलाके गहरे अंधेरे में डूबे रहे, जिससे रेस्क्यू ऑपरेशन्स और जलभराव से जूझ रहे आम लोगों की मुश्किलें और भी बढ़ गईं।

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क्लाइमेट चेंज (Climate Change) सिर्फ एक इत्तेफाक या नया नॉर्मल ?

दुनिया भर में मौसम के पैटर्न बदल रहे हैं, लेकिन बेंगलुरु इसका सबसे सीधा और पहला शिकार बन रहा है। पहले यहां की बारिश हल्की और सुहानी हुआ करती थी, जिसके लिए शहर मशहूर था। लेकिन अब यह 'एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स' (Extreme Weather Events) में बदल चुकी है। कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होना अब एक नया 'नॉर्मल' बनता जा रहा है। इसका साफ मतलब है कि हमें अपनी अर्बन प्लानिंग को 50 साल पुराने डेटा के बजाय, भविष्य के क्लाइमेट मॉडल्स पर रीडिजाइन करना होगा।

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