पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक युगांतरकारी और अप्रत्याशित घटनाक्रम के तहत अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सबसे वरिष्ठ स्तंभों में से एक और राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने संसद के उच्च सदन और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। दिल्ली में घटित इस राजनीतिक घटनाक्रम ने पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी के भीतर चल रहे गंभीर आंतरिक संकट को राष्ट्रीय राजधानी के सत्ता गलियारों तक पहुंचा दिया है। 77 वर्षीय अनुभवी राजनीतिज्ञ और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ रॉय ने अपने त्यागपत्र में तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर "एकतरफा संवाद" (One-Way Traffic) और सांगठनिक तानाशाही का आरोप लगाया है। यह इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब तृणमूल कांग्रेस हालिया विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त के बाद अपने इतिहास के सबसे बड़े आंतरिक विद्रोह और सांगठनिक बिखराव से जूझ रही है।
आरजी कर मेडिकल कॉलेज कांड वह मोड़ जिसने बदली बंगाल की राजनीतिक दिशा
सुखेंदु शेखर रॉय ने अपने इस्तीफे के पीछे मुख्य कारण अगस्त 2024 में कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में एक प्रशिक्षु महिला चिकित्सक के साथ हुए जघन्य बलात्कार और हत्याकांड के बाद सरकार के रवैये को बताया है। रॉय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस घटना के बाद कोलकाता की पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका अत्यंत संदिग्ध थी और साक्ष्यों को नष्ट करने के प्रयास किए गए थे।
साक्ष्यों को नष्ट करने और पुलिस अधिकारियों को बचाने का आरोप
रॉय ने मीडिया से बात करते हुए कहा, "मेरा एकमात्र दोष यह था कि मैंने उन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ आंतरिक जांच की मांग की थी, जिन्होंने साक्ष्यों को मिटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जब मैंने इस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से अपनी आवाज उठाई, तो मुझे पार्टी के भीतर पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया गया।" उन्होंने आरोप लगाया कि तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने इस पूरे संवेदनशील मामले में आत्ममंथन करने या दोषियों पर कार्रवाई करने के बजाय, प्रशासनिक मशीनरी का उपयोग करके पर्दा डालने का प्रयास किया।
जनता का स्वतःस्फूर्त आंदोलन
रॉय ने रेखांकित किया कि आरजी कर कांड ने पश्चिम बंगाल के सामाजिक और राजनीतिक ताने-बाने को हिलाकर रख दिया था। उन्होंने कहा, "पार्टी नेतृत्व यह समझने में पूरी तरह विफल रहा कि यह कोई सामान्य राजनीतिक विरोध नहीं था। जिन लोगों ने अपने जीवन में कभी किसी जुलूस या सार्वजनिक सभा में भाग नहीं लिया था, वे महिलाएं, चिकित्सक और आम नागरिक हफ़्तों तक रात-रात भर सड़कों पर बैठे रहे। जब जनता की आवाज को दबाया जाने लगा, तभी मैंने मानसिक रूप से इस दल को छोड़ने का निर्णय ले लिया था।"
'वन-वे ट्रैफिक' और सांगठनिक अधिनायकवाद का संकट
तृणमूल कांग्रेस के आंतरिक सांगठनिक ढांचे पर तीखा प्रहार करते हुए सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी के कामकाज को लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विपरीत बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी के भीतर अब किसी भी नीतिगत निर्णय में वरिष्ठ नेताओं या जमीनी कार्यकर्ताओं की राय नहीं ली जाती है।
ममता और अभिषेक बनर्जी का वर्चस्व
रॉय के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस पूरी तरह से एक "द्वि-सदस्यीय सत्ता केंद्र" में तब्दील हो चुकी है, जहां केवल पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी और उनके भतीजे व राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की इच्छा ही सर्वोपरि है। उन्होंने कहा, "टीएमसी में निर्णय प्रक्रिया पूरी तरह से 'वन-वे ट्रैफिक' बन चुकी है। केवल दो लोग बोलते हैं, बाकी सबको केवल सुनना और पालन करना होता है। पार्टी के भीतर विचार-विमर्श या असहमति के लिए कोई स्थान शेष नहीं बचा है।"
चुनावी पराजय की समीक्षा से इनकार
हाल ही में संपन्न हुए चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को मिली करारी शिकस्त का उल्लेख करते हुए रॉय ने बताया कि हार के बाद बुलाई गई आंतरिक बैठक में किसी भी प्रकार का आत्मनिरीक्षण नहीं किया गया। उन्होंने कहा, "मुझे उम्मीद थी कि बैठक में इस ऐतिहासिक हार के कारणों का पोस्टमार्टम किया जाएगा। लेकिन इसके विपरीत, पार्टी सुप्रीमो ने केवल इस बात पर जोर दिया कि भाजपा ने बलपूर्वक टीएमसी को हराया है। जब मैंने और कुछ अन्य नेताओं ने रचनात्मक सुझाव देने का प्रयास किया, तो हमें चुप करा दिया गया और अंत में कहा गया कि यदि कोई सुझाव है तो लिखकर दे दें। ऐसी स्थिति में संसद और दल में बने रहने का कोई औचित्य नहीं था।"
तृणमूल कांग्रेस का घटता सांगठनिक और विधायी प्रभाव (वर्ष 2026 की स्थिति)
सुखेंदु शेखर रॉय के इस्तीफे और राज्य में चल रहे दलबदल के बाद तृणमूल कांग्रेस की विधायी स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। निम्नलिखित तालिका संसद और राज्य विधानसभा में पार्टी की वर्तमान स्थिति को दर्शाती है:
| विधायी सदन | मूल संख्या (चुनाव परिणाम के समय) | वर्तमान संख्या (जून 2026) | सांगठनिक स्थिति और संकट का प्रभाव |
|---|---|---|---|
| राज्यसभा (Rajya Sabha) | 13 | 12 | सुखेंदु शेखर रॉय के इस्तीफे के बाद संख्या घटी; कई अन्य सांसदों के भाजपा नेतृत्व के संपर्क में होने की खबरें। |
| लोकसभा (Lok Sabha) | 28 | 28 | संख्या स्थिर है, परंतु आंतरिक रूप से काकोली घोष दस्तदार सहित लगभग 20 सांसदों ने बागी रुख अख्तियार किया है। |
| पश्चिम बंगाल विधानसभा | 80 | 22 (आधिकारिक रूप से वफादार) | 58 विधायकों ने आधिकारिक व्हिप के खिलाफ जाकर बागी नेता रितब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता चुनने के लिए मतदान किया। |
विधायिका से लेकर संसद तक चौतरफा आंतरिक विद्रोह
पश्चिम बंगाल की राजनीति के विश्लेषकों का मानना है कि सुखेंदु शेखर रॉय का इस्तीफा कोई एकल घटना नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक असंतोष का हिस्सा है जो तृणमूल कांग्रेस के भीतर पिछले कई महीनों से सुलग रहा था। यह संकट मुख्य रूप से दो स्तरों पर प्रकट हो रहा है:
1. विधानसभा में 58 विधायकों की ऐतिहासिक बगावत
पश्चिम बंगाल विधानसभा के भीतर तृणमूल कांग्रेस को उस समय सबसे बड़ा झटका लगा जब उसके 80 विधायकों में से 58 विधायकों के एक बड़े गुट ने पार्टी नेतृत्व द्वारा नामित शोवनदेब चट्टोपाध्याय के नाम को खारिज कर दिया। इस बागी गुट ने निष्कासित नेता रितब्रत बनर्जी को सदन का नेता (Leader of the House) बनाने के लिए मतदान किया। यह विधायी विद्रोह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि ममता बनर्जी का अपनी ही पार्टी के विधायकों पर से नियंत्रण लगभग समाप्त हो चुका है। बागी विधायकों का दावा है कि वे ही "वास्तविक तृणमूल कांग्रेस" का प्रतिनिधित्व करते हैं।
2. सांसदों का दिल्ली में जमावड़ा और आई-पैक (I-PAC) पर विवाद
पार्टी के पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं तथा नेताओं के बीच इस बात को लेकर तीव्र आक्रोश है कि अभिषेक बनर्जी द्वारा संचालित राजनीतिक रणनीतिक फर्म आई-पैक (I-PAC) को पार्टी के पारंपरिक सांगठनिक ढांचे से अधिक महत्व दिया जा रहा है। सुखेंदु शेखर रॉय ने इस बात की पुष्टि की है कि सोमवार सुबह तृणमूल कांग्रेस के लगभग 20 लोकसभा सांसदों ने दिल्ली में केंद्रीय मंत्री और भाजपा के पश्चिम बंगाल चुनाव प्रभारी भूपेंद्र यादव तथा पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के साथ एक उच्च स्तरीय बैठक की है। इस बैठक में रॉय स्वयं भी उपस्थित थे, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आने वाले दिनों में तृणमूल कांग्रेस के संसदीय दल में एक बड़ा विभाजन देखने को मिल सकता है।
प्रशासनिक और राजनीतिक निहितार्थ भ्रष्टाचार और संस्थागत पतन
सुखेंदु शेखर रॉय केवल एक राजनीतिज्ञ ही नहीं, बल्कि एक प्रख्यात अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ भी हैं। उनके द्वारा उठाए गए प्रशासनिक मुद्दों ने राज्य सरकार की नीतियों और शासन प्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
"पश्चिम बंगाल में पिछले 15 वर्षों से चल रहा शासन पूरी तरह से अराजकता, संस्थागत भ्रष्टाचार और महिला विरोधी अपराधों का गवाह रहा है। जनता ने इस कुशासन के खिलाफ अपना स्पष्ट जनादेश दिया है। 'Vox Populi, Vox Dei' (जनता की आवाज ही ईश्वर की आवाज है) और मैं इस जनादेश का सम्मान करता हूं।" - सुखेंदु शेखर रॉय (इस्तीफे के बाद जारी प्रेस विज्ञप्ति से)
अस्पतालों के खरीद तंत्र के फोरेंसिक ऑडिट की मांग
अपने इस्तीफे के साथ ही रॉय ने पश्चिम बंगाल के प्रशासनिक ढांचे में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए एक महत्वपूर्ण मांग रखी है। उन्होंने मांग की है कि पिछले पांच वर्षों के दौरान राज्य के सभी सरकारी अस्पतालों द्वारा की गई दवाओं, चिकित्सा उपकरणों और बुनियादी ढांचे की खरीद का तत्काल एक स्वतंत्र एजेंसी द्वारा 'फोरेंसिक ऑडिट' (Forensic Audit) कराया जाए। उनका आरोप है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में व्यापक पैमाने पर वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं, जिसके तार सीधे तौर पर सत्ताधारी दल के शीर्ष नेताओं से जुड़े हुए हैं। इसके साथ ही उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की संपत्तियों की भी जांच की मांग की है।
भाजपा के विकास मॉडल की सराहना
राज्यसभा के सभापति सी. पी. राधाकृष्णन को अपना इस्तीफा सौंपने के तुरंत बाद रॉय ने एक आधिकारिक प्रेस नोट जारी किया। इस नोट में उन्होंने पश्चिम बंगाल की वर्तमान भाजपा सरकार की नीतियों की खुलकर प्रशंसा की। उन्होंने लिखा कि भाजपा सरकार ने अपने चुनावी घोषणापत्र के वादों के अनुरूप राज्य के समग्र विकास, औद्योगिक पुनरुद्धार और कानून-व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। इस वक्तव्य को राजनीतिक हलकों में उनके औपचारिक रूप से भाजपा में शामिल होने की भूमिका के रूप में देखा जा रहा है।
निष्कर्ष और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य
सुखेंदु शेखर रॉय का तृणमूल कांग्रेस से अलग होना पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक युगांतरकारी घटना है। 60 वर्षों से अधिक का राजनीतिक अनुभव रखने वाले और पार्टी के स्थापना काल से ममता बनर्जी के सहयोगी रहे नेता का यह कदम दर्शाता है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर वैचारिक और सांगठनिक पतन की प्रक्रिया अब अपरिवर्तनीय चरण में पहुंच चुकी है। नई दिल्ली में राष्ट्रीय विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' (INDIA) की महत्वपूर्ण बैठक से ठीक कुछ घंटे पहले इस इस्तीफे की घोषणा ने राष्ट्रीय स्तर पर भी ममता बनर्जी की राजनीतिक साख को गंभीर ठेस पहुंचाई है।
यद्यपि तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने इस पर तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, परंतु पूर्व में ममता बनर्जी के बयानों से स्पष्ट है कि वे इसे एक साधारण दलबदल के रूप में दिखाने का प्रयास करेंगी। बहरहाल, विधायी विंग में 58 विधायकों की बगावत, सांसदों का भाजपा नेतृत्व के साथ संपर्क और सुखेंदु शेखर रॉय जैसे कद्दावर नेता का प्रस्थान यह स्पष्ट संकेत देता है कि पश्चिम बंगाल की सत्ता पर डेढ़ दशक तक काबिज रहने वाली तृणमूल कांग्रेस इस समय अपने सबसे गंभीर अस्तित्वगत संकट से गुजर रही है। आने वाले दिन इस बात का निर्धारण करेंगे कि क्या पार्टी इस सांगठनिक बिखराव को रोक पाती है या राज्य की राजनीति पूरी तरह से एक नए युग में प्रवेश कर जाएगी।