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पश्चिम एशिया संकट के बीच पीएम मोदी की हाई-लेवल बैठक क्या बनने जा रही है नई आर्थिक रणनीति?

पश्चिम एशिया संकट के बीच पीएम मोदी की हाई-लेवल बैठक क्या बनने जा रही है नई आर्थिक रणनीति?

नई दिल्ली: पश्चिम एशिया (West Asia) में गहराते जा रहे युद्ध और भू-राजनीतिक अस्थिरता के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार, 6 जून 2026 को प्रधानमंत्री आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) की एक बेहद महत्वपूर्ण और हाई-लेवल बैठक की अध्यक्षता की। इस बैठक में वैश्विक मंदी के खतरों के बीच भारत की विकास गति (Growth Momentum) को लगातार बनाए रखने, देश के आर्थिक लचीलेपन को और अधिक सुदृढ़ करने तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उभरती नई चुनौतियों से सुरक्षित ढंग से निपटने के उपायों पर बेहद गंभीर और विस्तृत रोडमैप तैयार किया गया।

आधिकारिक सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, इस विशेष बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु उन रणनीतियों को धरातल पर उतारना था, जो दुनिया भर में मची उथल-पुथल के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार को कम न होने दें। यह बैठक ऐसे नाजुक समय में बुलाई गई है, जब दुनिया की कई बड़ी और विकसित अर्थव्यवस्थाएं लगातार भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं, वैश्विक सप्लाई चैन (आपूर्ति श्रृंखला) में बड़े व्यवधानों और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कमजोर पड़ती मांग (Weakening Demand) जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रही हैं।

वैश्विक संकट के बावजूद 7.7% की दमदार रफ्तार से दौड़ रहा भारत

प्रधानमंत्री मोदी और परिषद में शामिल देश के दिग्गज अर्थशास्त्रियों व नीति विशेषज्ञों ने इस चुनौतीपूर्ण वैश्विक माहौल में समष्टि आर्थिक स्थिरता (Macroeconomic Stability) को हर हाल में सुनिश्चित करने पर बल दिया। बैठक के दौरान इस बात पर संतोष जताया गया कि तमाम अंतरराष्ट्रीय दबावों के बाद भी भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शीर्ष पर बना हुआ है।

हालिया सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही (जनवरी-मार्च) में भारत की जीडीपी (GDP) विकास दर 7.8 प्रतिशत की बेहद मजबूत स्थिति में दर्ज की गई है। इसके साथ ही, अगर पूरे वित्तीय वर्ष 2025-26 के प्रदर्शन पर नजर डालें, तो देश की कुल आर्थिक विकास दर 7.7 प्रतिशत निकलकर सामने आई है। भारतीय अर्थव्यवस्था की इस शानदार और ऐतिहासिक रफ्तार के पीछे मुख्य रूप से देश के कृषि (Agriculture), निर्माण (Construction) और सेवा (Services) क्षेत्रों का बेहद उम्दा और लगातार मजबूत प्रदर्शन रहा है, जिन्होंने वैश्विक झटकों को बेअसर करने में बड़ी भूमिका निभाई है।

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'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' और प्रशासनिक सुधारों पर जोर

आर्थिक मोर्चे पर देश को आत्मनिर्भर बनाने और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए बैठक में कई बड़े प्रशासनिक सुधारों पर भी विस्तृत चर्चा की गई। प्रधानमंत्री मोदी ने देश के भीतर 'ईज ऑफ लिविंग' (आम जीवन की सुगमता) और 'ईज ऑफ Doing Business' (व्यापार की सुगमता) को और अधिक बेहतर बनाने के लिए नीतिगत सुधारों को गति देने के निर्देश दिए। विचार-विमर्श के दौरान शासन व्यवस्था की दक्षता (Governance Efficiency) को बढ़ाने, विभिन्न क्षेत्रों में कंपनियों पर पड़ने वाले कानूनी और अनुपालन बोझ (Compliance Burdens) को कम करने तथा देश में घरेलू व विदेशी निवेश के साथ-साथ नए स्टार्टअप और उद्यमिता (Entrepreneurship) के लिए एक अधिक अनुकूल और पारदर्शी माहौल तैयार करने पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया।

पश्चिम एशिया संकट: कच्चे तेल और सप्लाई चेन को लेकर चिंताएं

बैठक के एक बड़े और महत्वपूर्ण सत्र में पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में जारी हिंसक संघर्ष के वैश्विक और भारतीय बाजारों पर पड़ने वाले संभावित दूरगामी प्रभावों का तकनीकी विश्लेषण किया गया। परिषद के सदस्यों ने इस बात को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की कि इस रणनीतिक क्षेत्र में लंबे समय तक खिंचने वाला तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजारों (Energy Markets), अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक समुद्री मार्गों (Trade Routes) और व्यापक आर्थिक स्थिरता को सीधे तौर पर प्रभावित कर सकता है। इस क्षेत्र में अनिश्चितता बढ़ने से दुनिया भर के शेयर बाजारों और कमोडिटी मार्केट में लगातार उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है।

भारत का तेल आयात और सरकार की चौकसी: भारत अपनी कुल ऊर्जा आवश्यकताओं और कच्चे तेल (Crude Oil) की जरूरतों का एक बहुत बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय बाजारों से आयात (Import) के माध्यम से पूरा करता है। ऐसी स्थिति में, पश्चिम एशिया में यदि अस्थिरता और बढ़ती है, तो इसका सीधा असर कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों और वैश्विक व्यापार प्रवाह पर पड़ सकता है। यही वजह है कि सरकार और संबंधित मंत्रालय इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद बारीक नजर बनाए हुए हैं ताकि देश के भीतर ईंधन संकट या महंगाई का दबाव न बढ़ सके।

आपको बता दें कि प्रधानमंत्री आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) भारत सरकार का एक बेहद प्रतिष्ठित और स्वतंत्र निकाय है, जिसमें देश के शीर्ष अर्थशास्त्रियों और नीति विशेषज्ञों को शामिल किया जाता है। यह परिषद देश के सामने मौजूद तत्कालीन और दीर्घकालिक आर्थिक व विकासात्मक मुद्दों पर अपने स्वतंत्र इनपुट और डेटा-आधारित विश्लेषण सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय को सौंपती है। इसके साथ ही यह परिषद उभरते वैश्विक आर्थिक रुझानों को भांपकर देश की दीर्घकालिक विकास प्राथमिकताओं को तय करने में सरकार को बेहद महत्वपूर्ण और रणनीतिक सलाह देने का काम करती है।

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