वैश्विक मंच: मध्य पूर्व (Middle East) में फैला भीषण सैन्य और कूटनीतिक गतिरोध अब दुनिया भर के गरीब और विकासशील देशों के लिए एक बड़ा मानवीय संकट बनता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र (UN) की अग्रणी संस्था वर्ल्ड फूड प्रोग्राम (WFP) ने शुक्रवार को एक बेहद चिंताजनक रिपोर्ट जारी करते हुए कहा है कि इस क्षेत्र में जारी तनाव की वजह से ईंधन और परिवहन की लागत में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। इस बढ़ी हुई लागत ने सीधे तौर पर खाद्य सामग्रियों की कीमतों को रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। इस दोहरी मार के बीच, अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसियों को मिलने वाले फंड में भारी कमी (Funding Shortfalls) दर्ज की गई है, जिसके कारण वे जरूरतमंदों तक पहुंचाई जाने वाली राहत सामग्री और मानवीय सहायता में बड़े पैमाने पर कटौती करने को मजबूर हो गई हैं। स्थिति यह है कि दुनिया भर में लाखों-करोड़ों लोग भुखमरी के बेहद करीब धकेले जा रहे हैं।
दरअसल, इस साल फरवरी के महीने में ईरान पर हुए संयुक्त अमेरिकी-इजरायली हवाई हमलों (Joint U.S.-Israeli strikes) के बाद से ही पूरा क्षेत्र एक भीषण और व्यापक सैन्य संघर्ष की चपेट में आ गया था। यह तनाव अब खाड़ी (Gulf) के देशों से लेकर लेबनान तक पूरी तरह फैल चुका है। इस युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार के सबसे महत्वपूर्ण जलमार्गों में से एक, 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) सहित कई प्रमुख शिपिंग रूटों को पूरी तरह से बाधित और असुरक्षित कर दिया है। इसके चलते मालवाहक जहाजों को अपने रूट बदलने पड़ रहे हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा प्रवाह (Global Energy Flows) और पूरी अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन बुरी तरह चरमरा गई है।
क्रूड ऑयल की तेजी और डराने वाले वैश्विक आंकड़े
वर्ल्ड फूड प्रोग्राम (WFP) ने इससे पहले मार्च के महीने में ही एक पूर्वानुमान जारी कर दुनिया को आगाह किया था। संस्था ने स्पष्ट कहा था कि यदि कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें जून तक लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास या उससे ऊपर बनी रहती हैं, तो दुनिया भर में लगभग 45 मिलियन (4.5 करोड़) लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा (Acute Food Insecurity) के जाल में फंस सकते हैं। अब WFP का वही सबसे डरावना अनुमान हकीकत में बदलता हुआ दिखाई दे रहा है, क्योंकि वैश्विक बेंचमार्क क्रूड की कीमतें मार्च की शुरुआत से ही लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल के पार बनी हुई हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर दबाव चरम पर पहुंच गया है।
इस वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक उथल-पुथल का सबसे दर्दनाक असर उन देशों पर पड़ रहा है जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं और खाद्यान्न के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर हैं। इनमें अफगानिस्तान, सोमालिया और श्रीलंका के नाम सबसे ऊपर हैं। इन देशों के आम परिवारों को भारी ईंधन लागत, स्थानीय बाजारों में खाद्य पदार्थों के बेकाबू दाम, आजीविका के साधनों और आमदनी में भारी गिरावट के साथ-साथ पूरी तरह ठप पड़े व्यापारिक तंत्र का सामना करना पड़ रहा है।
WFP रिपोर्ट 2026: वैश्विक भूख संकट के प्रमुख बिंदु
- ईंधन की मार: मार्च से लगातार कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार रहने से वैश्विक खाद्य कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचीं।
- सोमालिया का संकट: साल 2026 में देश की करीब एक तिहाई आबादी यानी 65 लाख लोग भीषण भुखमरी का सामना करने को मजबूर।
- अफगानिस्तान की स्थिति: देश में 1.74 करोड़ लोग खाद्य असुरक्षा की चपेट में; स्थिति न सुधरने पर 23 लाख और लोग इस दलदल में फंसेंगे।
- फंड की भारी कमी: बजट में कटौती के कारण WFP इस साल वैश्विक स्तर पर 15 लाख कम लोगों तक अपनी मदद पहुंचा पाएगी।
- सप्लाई चेन ठप: हिंद महासागर और ओमान के सलालाह पोर्ट पर मालवाहक जहाजों के फंसने से राहत सामग्री पहुंचने में हो रही गंभीर देरी।
सोमालिया और अफगानिस्तान में मानवीय त्रासदी की आशंका
वर्ल्ड फूड प्रोग्राम (WFP) के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, अकेले सोमालिया में साल 2026 के भीतर लगभग 6.5 मिलियन (65 लाख) लोग – जो कि देश की कुल आबादी का करीब एक-तिहाई हिस्सा है – गंभीर भुखमरी का सामना करने की कगार पर खड़े हैं। यदि सप्लाई चेन की यह रुकावटें और वैश्विक तनाव इसी तरह जारी रहा, तो स्थिति और भयावह हो जाएगी तथा अन्य 2.5 मिलियन (25 लाख) सोमाली नागरिक भी इस संकट की चपेट में आ जाएंगे। ठीक इसी तरह के हालात अफगानिस्तान में भी बने हुए हैं, जहां वर्तमान में 17.4 मिलियन (1.74 करोड़) लोग इस संकट से सीधे प्रभावित हैं और आने वाले समय में 2.3 मिलियन (23 लाख) और अफगानी नागरिकों के भुखमरी के दलदल में गिरने की आशंका जताई गई है।
यह पूरी स्थिति इसलिए भी बदतर होती जा रही है क्योंकि वैश्विक स्तर पर मानवीय मदद पहुंचाने वाली सहायता एजेंसियों के बजट में भारी गिरावट आई है। डब्ल्यूएफपी (WFP) ने साफ किया है कि इस गहरे फंडिंग संकट के चलते वे साल 2026 में दुनिया भर में लगभग 1.5 मिलियन (15 लाख) कम लोगों को अपनी सेवाएं दे पाएंगे। यदि मिडिल ईस्ट के यह हालात अगले छह महीनों तक ऐसे ही बने रहे, तो सहायता से वंचित रहने वाले लोगों का यह आंकड़ा बढ़कर सीधे 9 मिलियन (90 लाख) तक पहुंच सकता है, जो कि एक अभूतपूर्व वैश्विक मानवीय विफलता होगी।
मासूम बच्चों पर मंडराया कुपोषण का खतरा; जमीनी हालात बेहद नाजुक
इस संकट की सबसे बड़ी और दर्दनाक कीमत सोमालिया के उन मासूम बच्चों को चुकानी पड़ रही है जो पहले से ही मध्यम कुपोषण (Moderate Malnutrition) का शिकार हैं। सोमालिया में डब्ल्यूएफपी को इस समय रिकॉर्ड 89 प्रतिशत के फंडिंग गैप (बजट की कमी) का सामना करना पड़ रहा है। इसके चलते 5 साल से कम उम्र के कुपोषित बच्चों के लिए दी जाने वाली विशेष पौष्टिक खाद्य सामग्रियों का स्टॉक आगामी जुलाई के महीने में पूरी तरह खत्म होने की कगार पर है, जिससे लाखों बच्चों की जान पर बन आएगी।
"हमारे पास भोजन का स्टॉक तेजी से खत्म हो रहा है। वितरण के लिए खाद्य सामग्रियां उपलब्ध ही नहीं हैं, और इस पूरी त्रासदी का सबसे पहला और सीधा शिकार हमारे बेहद संवेदनशील और मासूम बच्चे होने जा रहे हैं।"
जमीनी स्तर पर इस संकट को और हवा दे रही हैं सप्लाई चेन से जुड़ी स्थानीय दिक्कतें। हिंद महासागर में बढ़ते खतरों और जहाजों पर हो रहे हमलों के कारण मालवाहक जहाजों ने सोमालिया के तटों पर रुकना बेहद कम कर दिया है। इसके अलावा, डब्ल्यूएफपी (WFP) की कुछ बेहद महत्वपूर्ण राहत सामग्रियों के स्टॉक ओमान के 'सलालाह पोर्ट' (Salalah Port) पर फंसे हुए हैं, जिसकी वजह से प्रभावित इलाकों तक समय पर मदद नहीं पहुंच पा रही है। आसमान छूती जेट ईंधन (Jet Fuel) की कीमतों ने संयुक्त राष्ट्र मानवीय हवाई सेवा (UNHAS) के परिचालन खर्च को भी कई गुना बढ़ा दिया है, जो कि दुनिया के सबसे दुर्गम और खतरनाक इलाकों तक सुरक्षित सहायता पहुंचाने का एकमात्र जरिया है।
अफगानिस्तान में पांच गुना तक महंगी हुई परिवहन लागत
वहीं अगर अफगानिस्तान की बात करें, तो वहां ईंधन की बढ़ी हुई कीमतों ने आंतरिक लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन की कमर तोड़ कर रख दी है। WFP के अनुसार, दुर्गम इलाकों में राहत सामग्री पहुंचाने वाले ट्रकों और वाहनों की परिवहन लागत में पांच गुना (Fivefold) तक का भारी इजाफा दर्ज किया गया है। इसके साथ ही, मुख्य व्यापारिक मार्ग बाधित होने के कारण ट्रकों को बेहद लंबे और वैकल्पिक रास्तों (Alternative Corridors) का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। इसका सीधा नतीजा यह हुआ है कि जो सहायता सामग्री पहले महज 10 दिनों के भीतर जरूरतमंदों तक पहुंच जाती थी, उसे पहुंचने में अब 75 दिनों तक का लंबा समय लग रहा है।
बदलते भू-राजनीतिक समीकरण और अनिश्चित भविष्य
अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि मिडिल ईस्ट का यह संघर्ष अब केवल एक क्षेत्रीय राजनीतिक विवाद नहीं रह गया है, बल्कि इसने पूरी दुनिया की खाद्य और आर्थिक सुरक्षा पर सीधा हमला किया है। आयातित भोजन और ईंधन पर पूरी तरह निर्भर देशों के पास इस वैश्विक महंगाई से निपटने के लिए कोई ठोस आंतरिक नीति उपलब्ध नहीं है। जब तक विश्व की महाशक्तियां मिलकर इन शिपिंग कॉरिडोर्स को सुरक्षित नहीं करतीं और सहायता एजेंसियों के फंडिंग संकट को दूर नहीं किया जाता, तब तक यह मानवीय त्रासदी आने वाले समय में और अधिक हिंसक और अनियंत्रित रूप अख्तियार कर सकती है।