भारत की अर्थव्यवस्था इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां ऊर्जा की मांग और औद्योगिक विस्तार दोनों अभूतपूर्व गति से आगे बढ़ रहे हैं। इस बदलाव के बीच, देश का इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट (विद्युत उपकरण) क्षेत्र एक बड़े बदलाव की दहलीज पर है। मैकिन्से एंड कंपनी (McKinsey & Company) की हालिया रिपोर्ट “वायर्ड फॉर ग्रोथ: इंडियाज इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट अपॉर्चुनिटी” के मुताबिक, भारत का घरेलू इलेक्ट्रिकल उपकरण उत्पादन साल 2035 तक 195 अरब डॉलर से लेकर 235 अरब डॉलर (करीब 235 Billion USD) के स्तर को छू सकता है।
यह आंकड़ा इसलिए चौंकाने वाला है क्योंकि साल 2025 में यह बाजार महज 50 अरब डॉलर के आसपास आंका गया है। यानी अगले एक दशक में इस सेक्टर में चार से पांच गुना बढ़ोतरी की संभावना है। लेकिन इस चमकते आंकड़े के पीछे एक गंभीर चेतावनी भी छिपी है, जिसे नजरअंदाज करना भारतीय विनिर्माण (Manufacturing) क्षेत्र के लिए भारी पड़ सकता है। रिपोर्ट के तकनीकी विश्लेषण और आंकड़ों के आधार पर यह स्पष्ट है कि यदि घरेलू उत्पादन की रफ्तार नहीं बदली, तो भारत एक बड़े आयात जाल में फंस सकता है।
बाजार का आकार और मांग का नया गणित
रिपोर्ट के अनुसार, केवल उत्पादन ही नहीं, बल्कि देश के भीतर इन उपकरणों की घरेलू खपत भी तेजी से बढ़ेगी। साल 2035 तक भारत में इलेक्ट्रिकल उपकरणों की घरेलू मांग 170 अरब डॉलर से 205 अरब डॉलर के बीच पहुंचने का अनुमान है। इसके साथ ही, निर्यात (Exports) के मोर्चे पर भी भारत के पास वैश्विक बाजार में अपनी धाक जमाने का एक बड़ा मौका होगा, जहां भारतीय निर्यात 60 अरब डॉलर के पार जा सकता है।
इस विकास दर को गति देने के लिए सालाना 11 से 13 फीसदी की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) की जरूरत होगी। यह वृद्धि दर मुख्य रूप से निम्नलिखित क्षेत्रों में आ रहे बदलावों से संचालित हो रही है:
- नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy): सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं का तेजी से विस्तार।
- ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर (Grid Infrastructure): पुराने बिजली ग्रिडों का आधुनिकीकरण और नए सब-स्टेशनों का निर्माण।
- पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और बैटरियां: इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (Energy Storage) की बढ़ती मांग।
पिछले पांच वर्षों के प्रदर्शन को देखें तो वित्तीय वर्ष 2025 तक घरेलू खपत 11 फीसदी की वार्षिक दर से बढ़कर 59 अरब डॉलर तक पहुंच चुकी है। यह दर्शाता है कि बाजार में मांग की निरंतरता बनी हुई है, लेकिन आपूर्ति के मोर्चे पर भारतीय उद्योग पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हो पाया है।
बिजनेस-एज-यूजुअल' का खतरा $130 बिलियन का नुकसान और 70% आयात
इस रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण और चिंताजनक पहलू वह चेतावनी है जो सामान्य कामकाजी ढर्रे यानी 'बिजनेस-एज-यूजुअल' (Business-as-usual) परिदृश्य को लेकर दी गई है। आंकड़ों के मुताबिक, साल 2020 में भारत की इस सेक्टर में आयात पर निर्भरता 22 फीसदी थी, जो साल 2025 में बढ़कर 33 फीसदी हो चुकी है। इसका सीधा मतलब यह है कि जैसे-जैसे हमारी मांग बढ़ रही है, हम घरेलू स्तर पर उत्पादन बढ़ाने के बजाय विदेशी सामानों पर अधिक निर्भर होते जा रहे हैं।
मैकिन्से की चेतावनी: यदि भारत ने अपनी विनिर्माण नीतियों और उत्पादन क्षमता में तुरंत कोई बड़ा नीतिगत या ढांचागत बदलाव नहीं किया, तो साल 2035 तक आयात पर निर्भरता 70 फीसदी के खतरनाक स्तर को पार कर सकती है। ऐसी स्थिति में देश को 130 अरब डॉलर से अधिक के उत्पादन घाटे (Production Shortfall) का सामना करना पड़ेगा।
यह स्थिति न केवल देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डालेगी, बल्कि 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' जैसे राष्ट्रीय अभियानों के बुनियादी उद्देश्यों को भी प्रभावित कर सकती है। घरेलू स्तर पर क्षमता विस्तार की कमी के कारण भारतीय कंपनियां वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) में केवल असेंबलर बनकर रह सकती हैं, न कि मूल निर्माता।
समाधान 5 गुना क्षमता विस्तार और रणनीतिक स्थानीयकरण (Localisation)
इस संभावित संकट से बचने के लिए रिपोर्ट में एक स्पष्ट और कड़ा रोडमैप सुझाया गया है। भारत को अगले दस वर्षों में अपनी घरेलू विनिर्माण क्षमता में पांच गुना (5x) का इजाफा करना होगा। यह विस्तार सामान्य उपकरणों में नहीं, बल्कि उच्च तकनीक वाले और रणनीतिक घटकों में होना चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि भारत आक्रामक तरीके से क्षमता बढ़ाता है और स्थानीयकरण पर ध्यान केंद्रित करता है, तो वर्तमान 33 फीसदी की आयात निर्भरता को घटाकर 2035 तक 14 फीसदी से भी नीचे लाया जा सकता है। इसके लिए मुख्य रूप से छह प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना होगा:
| क्र.सं. | प्रमुख क्षेत्र (Key Focus Areas) | स्थानीयकरण का रणनीतिक महत्व |
|---|---|---|
| 1 | पावर इलेक्ट्रॉनिक्स (Power Electronics) | इनवर्टर, कनवर्टर और औद्योगिक नियंत्रण प्रणालियों में विदेशी चिप्स और घटकों पर निर्भरता कम करना। |
| 2 | सोलर पीवी सेल्स और मॉड्यूल्स (Solar PV Chain) | सैल और वेफर निर्माण के स्तर पर चीन जैसे देशों से आयात को पूरी तरह नियंत्रित करना। |
| 3 | एडवांस्ड बैटरियां (Batteries) | ग्रिड-स्केल स्टोरेज और ईवी सेक्टर के लिए लिथियम-आयन और वैकल्पिक बैटरी तकनीकों का घरेलू उत्पादन। |
| 4 | एयर-कंडीशनर कंप्रेसर (AC Compressors) | घरेलू उपकरण क्षेत्र में कंप्रेसर के आयात को घरेलू विनिर्माण से बदलना। |
| 5 | हाई-एंड ट्रांसफॉर्मर्स (Transformers) | उच्च वोल्टेज (UHV/EHV) पारेषण लाइनों के लिए आवश्यक विशेष ट्रांसफॉर्मर का निर्माण। |
| 6 | विशेष केबल्स और वायर्स (Cables & Wires) | सबसी (समुद्र के भीतर) और हाई-स्पीड रेल परियोजनाओं के लिए तकनीकी रूप से उन्नत केबलों का विकास। |
वैश्विक बाजार में नए अवसर: $400 बिलियन की खिड़की
इस बदलाव का एक दूसरा पहलू यह भी है कि भू-राजनीतिक समीकरणों के बदलने के कारण दुनिया भर की कंपनियां अब 'चाइना प्लस वन' (China + 1) की रणनीति अपना रही हैं। भारत के पास इस वैश्विक बदलाव का लाभ उठाने का एक बेहतरीन मौका है। रिपोर्ट में कुछ ऐसे उभरते हुए तकनीकी क्षेत्रों की पहचान की गई है, जहां वैश्विक स्तर पर मांग तेजी से बढ़ रही है:
- नवीकरणीय ऊर्जा उपकरण और उन्नत केबल्स: साल 2035 तक केवल इन दो क्षेत्रों में ही वैश्विक स्तर पर 350 से 400 अरब डॉलर के नए अवसर पैदा होने का अनुमान है। इसमें सबसी केबल्स (Subsea Cables) और हाई-स्पीड रेल नेटवर्क के लिए आवश्यक विशेष केबलिंग शामिल हैं।
- पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और सॉफ्टवेयर: वैश्विक पावर इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार के 2035 तक 140 अरब डॉलर से अधिक होने की उम्मीद है। बिजली के कुशल वितरण और ग्रिड प्रबंधन के लिए सॉफ्टवेयर (Power Software) और ग्रिड स्टेबलाइजेशन तकनीकों की मांग दुनिया भर में बढ़ रही है।
भारत ने अतीत में सूचना प्रौद्योगिकी (IT Services) और ऑटो कंपोनेंट्स (Auto Components) के क्षेत्रों में अपनी वैश्विक नेतृत्व क्षमता साबित की है। जब भी सही सरकारी नीतियां, निजी क्षेत्र की उद्यमशीलता और तकनीकी नवाचार (Innovation) एक साथ आए हैं, भारतीय उद्योगों ने वैश्विक स्तर पर बड़े मुकाम हासिल किए हैं। ठीक इसी तरह के दृष्टिकोण और नीतिगत संरेखण की आवश्यकता आज इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट सेक्टर को भी है।
निष्कर्ष और आगे की राह
मैकिन्से की यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि भारत के इलेक्ट्रिकल उपकरण उद्योग के सामने जो राह है, वह असीमित संभावनाओं से भरी होने के साथ-साथ कड़ी चुनौतियों से भी घिरी है। 235 अरब डॉलर का बाजार बनना केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह देश के औद्योगिक ढांचे के पूर्ण कायाकल्प का अवसर है।
इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए केवल विनिर्माण इकाइयां स्थापित करना पर्याप्त नहीं होगा; बल्कि कच्चे माल की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना, अनुसंधान और विकास (R&D) में निवेश बढ़ाना और कुशल श्रमशक्ति तैयार करना भी उतना ही आवश्यक होगा। यदि भारतीय उद्योग और नीति निर्माता समय रहते कदम उठाते हैं, तो भारत न केवल अपनी बिजली की बढ़ती घरेलू मांग को पूरा करने में आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि दुनिया के लिए एक प्रमुख और विश्वसनीय इलेक्ट्रिकल मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में भी उभरेगा।