नई दिल्ली/कानपुर: मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में छिड़ा भीषण सैन्य संघर्ष अब भारतीय अर्थव्यवस्था और रोजगार बाजार के लिए एक बड़ा संकट बनता जा रहा है. इस युद्ध के कारण भारतीय रोजगार के दो सबसे मजबूत स्तंभ—खाड़ी देशों (Gulf Countries) में मिलने वाली नौकरियां और भारत का मैन्युफैक्चरिंग एक्सपोर्ट—बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. दशकों से उत्तर भारत के उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से लेकर दक्षिण के केरल तक, लाखों परिवारों की आजीविका खाड़ी देशों से आने वाले पैसे (Remittances) और घरेलू एक्सपोर्ट हब पर टिकी रही है. लेकिन अब युद्ध के चलते बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय कामगार वापस लौटने को मजबूर हो रहे हैं, जिससे देश के भीतर लेबर मार्केट पर दबाव अप्रत्याशित रूप से बढ़ गया है.
खाड़ी देशों से दो महीने में लौटे 11 लाख भारतीय, वीजा लैप्स होने का बढ़ा खतरा
विदेश मंत्रालय के आधिकारिक सूत्रों से मिले हालिया आंकड़ों के मुताबिक, मिडिल ईस्ट में 28 फरवरी को शत्रुता और सैन्य कार्रवाई शुरू होने के बाद से लेकर अप्रैल के अंत तक लगभग 11 लाख भारतीय (जिसमें कामगार, यात्री और अन्य नागरिक शामिल हैं) इस क्षेत्र से वापस भारत लौट चुके हैं. खाड़ी देशों में काम करने वाले करीब 19 मिलियन (1.9 करोड़) प्रवासी भारतीयों में से लगभग 90 लाख अकेले खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों में रहते हैं. वर्ल्ड बैंक के ताजा अनुमान बताते हैं कि इस युद्ध के कारण खाड़ी देशों की आर्थिक विकास दर साल 2025 के 4.4% से घटकर 2026 में महज 1.3% पर सिमट सकती है. आर्थिक गतिविधियों में आई इस सुस्ती से वहां चल रहे बड़े प्रोजेक्ट्स रुक गए हैं और बड़े पैमाने पर छंटनी का दौर शुरू हो गया है, जिसके चलते भारतीय कामगारों के वीजा लैप्स होने का खतरा मंडरा रहा है.
कानपुर के चमड़ा उद्योग पर चौतरफा मार लागत बढ़ी उत्पादन हुआ आधा
इस विदेशी युद्ध का सीधा असर भारत के प्रमुख औद्योगिक केंद्रों पर भी दिख रहा है. उत्तर प्रदेश का औद्योगिक शहर कानपुर, जो भारत के सालाना 6 अरब डॉलर के लेबर-इंटेंसिव लेदर एक्सपोर्ट (चमड़ा निर्यात) में अकेले एक-चौथाई हिस्सेदारी रखता है, इस समय गंभीर संकट से जूझ रहा है. काउंसिल फॉर लेदर एक्सपोर्ट्स के मुताबिक, कानपुर का यह उद्योग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 5 लाख लोगों को रोजगार देता है. लेकिन होर्मुज जलडमरूStatus (Strait of Hormuz) में अस्थिरता और युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर ईंधन, गैस, लॉजिस्टिक्स और शिपिंग की लागत में भारी उछाल आया है. वैश्विक मांग कमजोर होने और लागत बढ़ने से कानपुर की फैक्ट्रियां अपनी क्षमता से महज आधी क्षमता पर काम कर रही हैं, जिससे नए रोजगार पैदा होना तो दूर, पुराने कर्मचारियों को रिटेन करना भी मुश्किल हो रहा है.
केरल के रेमिटेंस मॉडल पर मंडराया संकट युवाओं में बढ़ रही बेरोजगारी
दूसरी तरफ, दक्षिण भारतीय राज्य केरल की अर्थव्यवस्था पर भी इसका गहरा असर पड़ रहा है, जहां की जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आने वाले रेमिटेंस पर निर्भर करता है. अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजा गया रेमिटेंस 102.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, लेकिन जनवरी 2026 के बाद युद्ध छिड़ने से इस प्रवाह पर ब्रेक लगने की आशंका जताई जा रही है. केरल के 'नोन-रेसिडेंट केरालाइट्स अफेयर्स' (NORKA Roots) विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो खाड़ी देशों में आने वाली वित्तीय मंदी बड़े पैमाने पर प्रवासियों की घर वापसी का कारण बनेगी, जिससे केरल का पहले से ही तनावग्रस्त लेबर मार्केट और ज्यादा संकट में आ जाएगा.
मजबूत जीडीपी ग्रोथ के बीच अंडरएम्प्लॉयमेंट और एआई (AI) की नई चुनौती
आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि भारत की जीडीपी ग्रोथ भले ही 7% के आसपास बनी हुई है और आधिकारिक शहरी बेरोजगारी दर 6.6% है, लेकिन देश के भीतर रोजगार की गुणवत्ता (Job Quality) लगातार खराब हो रही है. हर साल भारत के लेबर मार्केट में 6 से 7 मिलियन (60-70 लाख) नए युवा प्रवेश करते हैं. वर्तमान में 15 से 29 वर्ष की आयु के शहरी युवाओं में बेरोजगारी दर लगभग 14% के उच्च स्तर पर है. इसके अलावा, सबसे बड़ी चिंता 'अंडरएम्प्लॉयमेंट' (अल्प-रोजगार) की है, जहां उच्च शिक्षित युवा अपनी योग्यता से बहुत कम वेतन या असुरक्षित गीग-इकोनॉमी (Gig Economy) और अनौपचारिक क्षेत्रों में काम करने को मजबूर हैं. इसके साथ ही, व्हाइट-कॉलर जॉब्स में तेजी से बढ़ रहे एआई-ऑटोमेशन (AI Automation) ने एंट्री-लेवल नौकरियों और वेतन वृद्धि की संभावनाओं को और सीमित कर दिया है.