
केदारनाथ मंदिर के बाहर से आए वीडियो में साफ दिख रहा है कि व्यवस्थाएं पूरी तरह चरमरा गई हैं। एक तरफ वे लोग हैं जो पिछले 15-20 घंटों से भूखे-प्यासे लाइन में खड़े हैं, वहीं दूसरी ओर ‘खास’ लोग हैं जिन्हें वीआईपी प्रवेश के नाम पर सीधे दर्शन करवाए जा रहे हैं।

लाइन में खड़े श्रद्धालुओं का गुस्सा तब फूट पड़ा जब घंटों इंतजार के बाद भी भीड़ आगे नहीं बढ़ी। सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो में लोग “मुर्दाबाद” के नारे लगाते और पुलिस-प्रशासन से बहस करते दिख रहे हैं। एक महिला श्रद्धालु ने रोते हुए बताया कि उन्हें धक्के दिए जा रहे हैं, बच्चे भीड़ में दब रहे हैं और कोई सुनने वाला नहीं है। सवाल उठता है कि क्या सिर्फ सिफारिश वालों को ही सम्मान मिलेगा?

एक बेटे की पुकार और प्रशासन की संवेदनहीनता

इस यात्रा का सबसे दुखद पहलू गुजरात के एक परिवार के साथ हुआ। दिलीप भाई माली, जो अपने पापा और मां के साथ दर्शन के लिए आए थे, यात्रा शुरू होते ही हार्ट की परेशानी का शिकार हो गए। उनकी मृत्यु ने परिवार को तोड़ दिया।
उनके बेटे हेमंत माली ने पिता के पार्थिव शरीर को नीचे ले जाने के लिए प्रशासन से मदद मांगी। उन्होंने बार-बार हेलीकॉप्टर की मांग की ताकि अंतिम संस्कार के लिए घर ले जा सकें, लेकिन अधिकारियों ने नए नियमों और डीजीसीए की अनुमति का हवाला देकर मना कर दिया।
हैरानी की बात यह रही कि उसी समय जिला अधिकारी और अन्य वीआईपी हेलीकॉप्टर का उपयोग कर रहे थे। आम नागरिक के लिए नियम सख्त और वीआईपी के लिए ढीले—यह तस्वीर सिस्टम की असंवेदनशीलता को साफ दिखाती है।
जानलेवा भीड़ और बिगड़ते हालात
मंदिर परिसर से सामने आए ताजा वीडियो बेहद चिंताजनक हैं। रेलिंग के पास इतनी भीड़ है कि लोगों का सांस लेना मुश्किल हो रहा है। लोग एक-दूसरे पर गिर रहे हैं और इसी अफरा-तफरी में झगड़े और मारपीट की नौबत आ रही है।
श्रद्धालु सवाल कर रहे हैं क्या हम बेवजह घंटों से खड़े हैं सुरक्षा कर्मी भी भीड़ को संभालने में असमर्थ नजर आ रहे हैं। अगर समय रहते स्थिति नहीं संभाली गई, तो किसी बड़े हादसे से इनकार नहीं किया जा सकता।
क्या अब यह यात्रा सिर्फ अमीरों के लिए ?
केदारनाथ से आ रही खबरें एक बड़ा सवाल खड़ा करती हैं—क्या यह यात्रा अब सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए रह गई है जो वीआईपी सुविधा या महंगे हेलीकॉप्टर का खर्च उठा सकते हैं? एक आम व्यक्ति, जो सालों तक पैसे जोड़कर यहां आता है, क्या उसकी सुरक्षा और सम्मान की कोई कीमत नहीं?
प्रशासन हर साल बेहतर व्यवस्था के दावे करता है—डिजिटल पंजीकरण, भीड़ नियंत्रण, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं—लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। एक श्रद्धालु की मृत्यु के बाद भी उसे सम्मानजनक विदाई न मिलना, जबकि वीआईपी आराम से यात्रा कर रहे हैं, यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाता है।