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केरल में मुख्यमंत्री पद की दौड़ कांग्रेस के लिए निर्णय की घड़ी

केरल में मुख्यमंत्री पद की दौड़ कांग्रेस के लिए निर्णय की घड़ी

तिरुवनंतपुरम/नई दिल्ली : केरल विधानसभा चुनाव में यूडीएफ की ऐतिहासिक जीत के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि राज्य का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा। कांग्रेस के भीतर चल रही यह अंदरूनी खींचतान केवल एक पद की लड़ाई नहीं है यह पार्टी की दिशा, उसके भविष्य और केरल जैसे अंतिम गढ़ को संभालने की क्षमता की परीक्षा है।

140 सीटों वाली विधानसभा में यूडीएफ ने 102 सीटें जीतकर जो विश्वास जनता से अर्जित किया है, उसे बनाए रखना कांग्रेस के लिए उतना ही जरूरी है जितना चुनाव जीतना था। पर विडंबना यह है कि जिस पार्टी ने वामपंथी मोर्चे को इतनी करारी शिकस्त दी, वही अब अपने नेता का चुनाव करने में उलझी हुई है।

तीन दावेदार एक कुर्सी

मुख्यमंत्री पद की दौड़ में तीन नाम सबसे आगे हैं — केसी वेणुगोपाल, वीडी सतीशन और रमेश चेन्निथला। तीनों वरिष्ठ नेता हैं, तीनों के अपने-अपने समर्थक हैं और तीनों की अपनी-अपनी राजनीतिक विरासत है।

केसी वेणुगोपाल — पूरा नाम कोझुम्मल चट्टाडि वेणुगोपाल — का जन्म 4 फरवरी 1963 को केरल के कण्णूर जिले के पय्यन्नूर में हुआ था। वे छात्र राजनीति से कांग्रेस में आए और 1996, 2001 तथा 2006 में अलप्पुझा से विधायक रहे। सीएम ओमेन चांडी के कार्यकाल में उन्होंने पर्यटन मंत्री का दायित्व संभाला। 2009 और 2014 में अलप्पुझा लोकसभा सीट से सांसद बने। 2020 में राजस्थान से राज्यसभा सदस्य बने और 2024 में एक बार फिर अलप्पुझा से भारी मतों से लोकसभा पहुंचे।

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वेणुगोपाल की असली ताकत दिल्ली में है। अप्रैल 2017 से वे एआईसीसी के महासचिव (संगठन) हैं। इस पद पर रहते हुए उम्मीदवार चयन, पार्टी अनुशासन, सदस्यता अभियान और गठबंधन प्रबंधन जैसे अहम फैसलों में उनकी केंद्रीय भूमिका रही है। संसद में वे राहुल गांधी की तत्काल बाईं ओर बैठते हैं और यह महज आसन-व्यवस्था नहीं, बल्कि राजनीतिक निकटता का प्रतीक है।

जून 2024 में जब कांग्रेस ने 99 लोकसभा सीटें जीतीं, तो यह वेणुगोपाल ही थे जिन्होंने औपचारिक रूप से घोषणा की कि राहुल गांधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष होंगे। यह क्षण उनकी पार्टी में हैसियत को बखूबी दर्शाता है।

संख्याओं की राजनीति

हालिया घटनाक्रम पर नजर डालें तो 12 मई को राहुल गांधी ने केरल के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की। इसमें यूडीएफ संयोजक अधूर प्रकाश, केपीसीसी अनुशासन समिति के प्रमुख तिरुवनचूर राधाकृष्णन, केपीसीसी के पांच पूर्व अध्यक्ष और तीन कार्यकारी अध्यक्ष शामिल थे।

इन दस नेताओं में से सात ने वेणुगोपाल को समर्थन दिया। दो नेताओं के. मुरलीधरन और वीएम सुधीरन  ने सतीशन का पक्ष लिया, जबकि एक तटस्थ रहा। एआईसीसी पर्यवेक्षकों मुकुल वासनिक और अजय माकन ने सभी 63 कांग्रेस विधायकों से अलग-अलग मुलाकात की, और उनकी रिपोर्ट पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को सौंपी गई। इस सर्वे में भी वेणुगोपाल का पलड़ा भारी बताया जा रहा है।

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सतीशन की दावेदारी और उनकी ताकत

वीडी सतीशन छह बार के विधायक हैं  2001 से लगातार एर्नाकुलम जिले की परावूर सीट से जीतते आ रहे हैं। 2021 में यूडीएफ की हार के बाद उन्होंने रमेश चेन्निथला की जगह केरल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका संभाली। पिछले पांच वर्षों में वे पिनराई विजयन सरकार के सबसे मुखर आलोचक रहे।

2026 के चुनाव से पहले उन्होंने स्पष्ट किया था, "अगर यूडीएफ हारी, तो मैं अगले ही दिन राजनीति से संन्यास लेकर 'वनवास' चला जाऊंगा।" वे नहीं गए  क्योंकि यूडीएफ जीती। और इस जीत का एक बड़ा श्रेय उनकी राज्यव्यापी यात्राओं और जमीनी लड़ाई को जाता है।

उनकी दावेदारी के पीछे एक और अहम तर्क है  गठबंधन के दूसरे सबसे बड़े सहयोगी आईयूएमएल के 22 विधायक उनके साथ हैं। यह समर्थन किसी भी मुख्यमंत्री के लिए अनिवार्य राजनीतिक पूंजी है।

चेन्निथला अनुभव है पर वक्त बीत चुका

रमेश चेन्निथला केरल के इतिहास में सबसे युवा मंत्री बनने का रिकॉर्ड रखते हैं। वे केपीसीसी अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष और गृहमंत्री रह चुके हैं। 2026 के चुनाव में वे प्रचार समिति के प्रमुख थे।

पर अब वे स्वयं कह चुके हैं: हम जो कहना था, हाईकमान को कह दिया। बाकी उनका फैसला है। इस वक्तव्य के बाद राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि चेन्निथला की दौड़ व्यावहारिक रूप से खत्म हो चुकी है।

वेणुगोपाल के सामने एक व्यावहारिक अड़चन

अगर वेणुगोपाल को मुख्यमंत्री चुना जाता है तो एक महत्वपूर्ण संवैधानिक तथ्य सामने आता है  वे 2026 के केरल विधानसभा चुनाव में खड़े ही नहीं हुए थे। नियम के अनुसार, पदभार ग्रहण करने के छह महीने के भीतर उन्हें किसी सीट से उपचुनाव जीतकर विधायक बनना होगा। यह कोई असाध्य समस्या नहीं है  कांग्रेस के पास पर्याप्त बहुमत है और कोई भी सीट उनके लिए रास्ता बन सकती है। लेकिन यह एक राजनीतिक जोखिम जरूर है।

सरकार गठन की अंतिम तिथि 23 मई 2026 है।

कर्नाटक की गलती दोहराने का डर राजनीतिक टिप्पणीकार बार-बार एक तुलना कर रहे हैं  2023 में कर्नाटक में कांग्रेस की ऐतिहासिक जीत के बाद जो सिद्धारमैया बनाम डीके शिवकुमार की सत्ता-खींचतान शुरू हुई, वह आज तक खत्म नहीं हुई। वहां कोई कैबिनेट फेरबदल नहीं हुआ, कोई प्रशासनिक रोडमैप नहीं बना, और पार्टी अंदरूनी लड़ाई में उलझी रही।

केरल में भी ऐसा ही खतरा मंडरा रहा है। यदि कांग्रेस नेतृत्व ने त्वरित और स्पष्ट निर्णय नहीं लिया, तो जो जनादेश मिला है वह बर्बाद हो सकता है। एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि कर्नाटक में शिवकुमार और सिद्धारमैया अलग-अलग जाति समीकरणों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि केरल के तीनों दावेदार  वेणुगोपाल, सतीशन और चेन्निथला  नायर समुदाय से हैं। इसलिए जाति की राजनीति यहां कम जटिल है। केवल नेतृत्व की दृढ़ इच्छाशक्ति चाहिए।

9 मई की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस और शांति की अपील

9 मई को तीनों दावेदारों  वेणुगोपाल, सतीशन और चेन्निथला  ने हाईकमान से मुलाकात के बाद एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस की। वेणुगोपाल ने इस मौके पर कार्यकर्ताओं से संयम रखने की अपील की। उन्होंने कहा, बीच-बीच में कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं होती हैं। हम उन्हें पीछे छोड़ना चाहते हैं। हम सब पार्टी कार्यकर्ता हैं और हमारी पहली प्राथमिकता पार्टी और जनता है। यह बयान उस पृष्ठभूमि में आया जब विभिन्न गुटों के समर्थक एक-दूसरे के खिलाफ फ्लेक्स बोर्ड लगा रहे थे और रैलियां कर रहे थे।

राहुल और वेणुगोपाल एक गहरा राजनीतिक रिश्ता

18वीं लोकसभा में वेणुगोपाल संसद में राहुल के सबसे करीबी सहयोगी के रूप में उभरे हैं। जून 2024 में जब नीट पेपर लीक विवाद के दौरान राहुल का माइक बंद करने का आरोप लगा, तो वेणुगोपाल ने लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव दाखिल किया। दिसंबर 2024 में जब राहुल को संभल जाने से रोका गया, तब भी वेणुगोपाल मैदान में उतरे।

अप्रैल 2026 में जब संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026  जो लोकसभा सीटें बढ़ाकर महिला आरक्षण लागू करने से जुड़ा था  लोकसभा में पारित न हो सका, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित कर विपक्ष की आलोचना की, तो वेणुगोपाल ने उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन नोटिस दाखिल किया। उन्होंने इस संबोधन को "अभूतपूर्व, अनैतिक और सत्ता का घोर दुरुपयोग" करार दिया।

आगे क्या ?

केरल कांग्रेस का अंतिम गढ़ है। 2026 में मिली यह जीत पार्टी के लिए एक नई शुरुआत का अवसर है  पर यही अवसर अगर सही तरह से नहीं संभाला गया तो यह विनाश का द्वार भी बन सकता है।

जनता ने यूडीएफ को वामपंथी सरकार से बदलाव के लिए वोट दिया है। उन्हें अस्थिरता नहीं, स्पष्ट नेतृत्व चाहिए। चाहे वह वेणुगोपाल हों, सतीशन हों या कोई और  फैसला जल्द, साफ और अंतिम होना चाहिए।

राहुल गांधी, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और हाईकमान के सामने अब वह क्षण है जब निर्णायकता ही एकमात्र सही राजनीतिक चाल है। अगर यह मौका चूका, तो इतिहास एक बार फिर दोहराया जाएगा और इस बार, केरल में।

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