भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने नीति निर्माताओं से लेकर आम आदमी के किचन तक हलचल मचा दी है। देश में लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) की सप्लाई चेन इस वक्त अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। ताज़ा रिपोर्टों के अनुसार, भारत में एलपीजी का आयात (Import) पिछले कुछ महीनों में घटकर लगभग आधा रह गया है, वहीं घरेलू उत्पादन में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब हम देखते हैं कि भारत अपनी कुल खपत का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से मंगवाता है।
आइए इस पूरे संकट की गहराई, इसके पीछे की भू-राजनीतिक वजहों और भविष्य की चुनौतियों का विस्तार से विश्लेषण करते हैं।
आंकड़ों की जुबानी सप्लाई चेन में आई बड़ी गिरावट
फरवरी और मार्च के आंकड़ों की तुलना अगर अप्रैल के शुरुआती हफ्तों से की जाए, तो तस्वीर काफी डरावनी नजर आती है।
आयात में गिरावट: फरवरी के महीने में भारत रोजाना औसत 73,000 टन LPG का आयात कर रहा था। लेकिन अप्रैल के पहले पखवाड़े (1 से 14 अप्रैल) के बीच यह आंकड़ा गिरकर महज 37,000 टन प्रतिदिन रह गया है।
घरेलू उत्पादन में कमी: केवल विदेशों से आने वाली गैस ही नहीं, बल्कि भारत की अपनी रिफाइनरियों और गैस क्षेत्रों से होने वाला उत्पादन भी पिछले महीने के मुकाबले 10 प्रतिशत तक कम हो गया है।
जब मांग (Demand) लगातार बढ़ रही हो और सप्लाई के दोनों मुख्य स्रोत (घरेलू और विदेशी) एक साथ गिर जाएं, तो यह एक बड़े 'एनर्जी क्राइसिस' का संकेत है।
संकट की जड़ में क्या है? अमेरिका-ईरान तनाव और लाल सागर का संघर्ष
भारत की एलपीजी सप्लाई पर आए इस दबाव के पीछे सबसे बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय राजनीति और युद्ध के हालात हैं। भारत अपनी गैस जरूरतों के लिए पारंपरिक रूप से पश्चिमी एशिया (मिडल ईस्ट) के देशों पर निर्भर रहा है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) की नाकेबंदी: यह समुद्री रास्ता दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण एनर्जी कॉरिडोर में से एक है। फरवरी तक भारत के कुल एलपीजी आयात का 90 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से आता था। लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और इजरायल-ईरान के बीच सीधी सैन्य कार्रवाई की आशंकाओं ने इस रास्ते को असुरक्षित बना दिया है। मौजूदा समय में इस रास्ते से होने वाला आयात गिरकर 55 प्रतिशत पर आ गया है।
ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हमले: ईरान के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों के खतरों ने वैश्विक शिपिंग कंपनियों को डरा दिया है। कई शिपमेंट या तो रद्द कर दिए गए हैं या उनके रास्ते बदल दिए गए हैं, जिससे सप्लाई पहुंचने में देरी हो रही है।
अमेरिका का उदय मगर लागत की चुनौती: हालांकि अमेरिका भारत के लिए एक बड़े सप्लायर के रूप में उभरा है, लेकिन भौगोलिक दूरी एक बड़ी बाधा है। खाड़ी देशों से गैस मंगवाना सस्ता और तेज होता है, जबकि अमेरिका से आने वाले जहाजों को लंबा रास्ता तय करना पड़ता है, जिससे ट्रांसपोर्टेशन की लागत बढ़ जाती है।
क्यों मुश्किल है तुरंत विकल्प ढूंढना ?
आम तौर पर लोगों को लगता है कि अगर एक देश से गैस नहीं मिल रही, तो दूसरे से तुरंत खरीद लेनी चाहिए। लेकिन एलपीजी का बाजार इतना सरल नहीं है।
लॉन्ग टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स: दुनिया की अधिकांश एलपीजी पहले से ही लंबे समय के समझौतों (Long-term contracts) के तहत बुक होती है। 'स्पॉट मार्केट' यानी तुरंत खरीद के लिए बहुत कम गैस उपलब्ध होती है।
भंडारण की क्षमता: भारत के पास एलपीजी को स्टोर करने की एक सीमित क्षमता है। अगर सप्लाई चेन में 15 दिनों का भी बड़ा गैप आता है, तो उसका असर सीधे डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर तक पहुंचने लगता है।
विशेषज्ञों की चेतावनी क्या यह संकट लंबा चलेगा ?
मनीकंट्रोल की एक हालिया रिपोर्ट में एक सरकारी अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर जो खुलासा किया है, वह बेहद चिंताजनक है। उनके मुताबिक, मौजूदा हालात को देखते हुए सप्लाई को पूरी तरह से बहाल होने में कम से कम तीन साल का समय लग सकता है।
यह समय सीमा इसलिए लंबी बताई जा रही है क्योंकि युद्धग्रस्त क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को जो नुकसान पहुंच रहा है, उसे ठीक करना और वैश्विक सप्लाई रूट को दोबारा सुरक्षित बनाना रातों-रात मुमकिन नहीं है। भारत के लिए बढ़ती आयात लागत (Import Cost) और रुपये की विनिमय दर भी इस संकट को और महंगा बना रही है।
आम जनता पर इसका क्या असर होगा?
LPG का संकट सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है, इसका सीधा असर मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर पड़ता है।
सिलेंडर की किल्लत: यदि आयात में सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले समय में बुकिंग के बाद सिलेंडर मिलने में लगने वाला समय (Waiting period) 2-3 दिन से बढ़कर 10-12 दिन तक हो सकता है।
महंगाई का बोझ: सरकार भले ही फिलहाल कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिश करे, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई कम होने पर कीमतें बढ़ना तय है। यदि सब्सिडी का बोझ सरकार नहीं उठाती है, तो सीधे तौर पर रसोई गैस महंगी हो सकती है।
व्यावसायिक प्रभाव: होटल, रेस्टोरेंट और छोटे उद्योगों में इस्तेमाल होने वाली कमर्शियल गैस की कीमतों में सबसे पहले उछाल देखने को मिल सकता है।
समाधान की राह
भारत के लिए यह समय अपनी ऊर्जा नीति पर दोबारा गौर करने का है। हम अपनी जरूरत के लिए पश्चिमी एशिया पर बहुत अधिक निर्भर हैं, और वहां की अस्थिरता हमें हर बार संकट में डालती है।
आगे का रास्ता क्या हो सकता है?
सप्लाई का विविधीकरण: भारत को रूस, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीकी देशों के साथ गैस समझौतों को और मजबूत करना होगा।
घरेलू अन्वेषण: भारत में ओएनजीसी और गेल जैसी कंपनियों को घरेलू गैस उत्पादन बढ़ाने के लिए नई तकनीकों और निवेश की जरूरत है।
विकल्पों की ओर झुकाव: सरकार को 'इलेक्ट्रिक कुकिंग' और 'सोलर कुकिंग' को और अधिक बढ़ावा देना होगा ताकि एलपीजी पर निर्भरता कम की जा सके।
फिलहाल, स्थिति नाजुक है। जब तक मिडिल ईस्ट में तनाव कम नहीं होता, तब तक भारत की एलपीजी सप्लाई पर अनिश्चितता के बादल मंडराते रहेंगे। सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह घरेलू बाजार में गैस की कमी न होने दे और बढ़ती अंतरराष्ट्रीय कीमतों से आम आदमी को सुरक्षित रखे।