महाराष्ट्र के नासिक में स्थित टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) के बीपीओ (BPO) यूनिट से सामने आई घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। जिसे एक प्रतिष्ठित कॉर्पोरेट ऑफिस माना जाता था, वहां से यौन शोषण, ब्लैकमेलिंग, ऑनलाइन स्टॉकिंग और धार्मिक धर्मांतरण के दबाव जैसे गंभीर आरोप सामने आए हैं। यह मामला तब और सुर्खियों में आ गया जब नेशनल कमीशन फॉर वुमेन (NCW) ने इसमें हस्तक्षेप किया।
मामले की शुरुआत दोस्ती से धोखे तक का सफर
इस पूरे विवाद की जड़ें करीब चार साल पुरानी हैं। मुख्य पीड़िता ने अपनी एफआईआर (FIR) में बताया कि उसकी मुलाकात एक युवक से हुई थी, जो आगे चलकर दोस्ती में बदल गई। उस समय पीड़िता स्नातक (Graduation) कर रही थी। आरोपी ने उसे भरोसा दिलाया था कि पढ़ाई पूरी होने के बाद वह उसे TCS जैसी बड़ी कंपनी में नौकरी दिलाने में मदद करेगा।
आरोप है कि साल 2022 में आरोपी ने पीड़िता की मर्जी के खिलाफ उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए और यह दावा किया कि वह उससे शादी करना चाहता है। इसके बाद पीड़िता ने नासिक स्थित TCS की शाखा में काम करना शुरू किया, जहां आरोपी पहले से ही कार्यरत था।
शादीशुदा होने की सच्चाई और विश्वासघात
पीड़िता का आरोप है कि साल 2024 में एक रिजॉर्ट में उसके साथ फिर से यौन उत्पीड़न किया गया। पीड़िता को अब तक लग रहा था कि आरोपी उससे शादी करेगा, लेकिन कहानी में मोड़ तब आया जब एक अनजान महिला ने पीड़िता से संपर्क किया। वह महिला आरोपी की पत्नी थी।
पीड़िता को यह जानकर गहरा सदमा लगा कि जिस व्यक्ति पर उसने भरोसा किया, वह न केवल शादीशुदा है बल्कि उसके दो बच्चे भी हैं। जब इस धोखे पर पीड़िता ने आरोपी से जवाब मांगा, तो उसने साफ कह दिया कि उसका शादी करने का कभी कोई इरादा नहीं था। यह खुलासा इस केस का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
लव जिहाद' और जबरन धर्मांतरण के गंभीर आरोप
इस मामले में केवल यौन शोषण ही नहीं, बल्कि धार्मिक प्रताड़ना का एंगल भी जुड़ गया है। पीड़िता ने पुलिस को दी गई अपनी शिकायत में स्पष्ट रूप से कहा है कि मुख्य आरोपी और उसके दो अन्य सहयोगियों (जो FIR में नामजद हैं) ने उस पर इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए लगातार दबाव बनाया। पीड़िता के अनुसार, उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया ताकि वह अपना धर्म बदल ले। यह आरोप इस मामले को और भी संवेदनशील बना देता है, क्योंकि इसमें कॉर्पोरेट संस्कृति के बीच धार्मिक कट्टरता की घुसपैठ दिखाई देती है।
सूत्रों के मुताबिक सोशल मीडिया पर स्टॉकिंग और अश्लीलता
मामले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, तकनीक के दुरुपयोग की बात भी सामने आई। सूत्रों के मुताबिक, जांच अधिकारियों को पता चला है कि आरोपी केवल ऑफिस तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि वे पीड़ितों की निजी जिंदगी में भी दखल दे रहे थे।
आरोपियों पर आरोप है कि वे महिला कर्मचारियों के सोशल मीडिया प्रोफाइल जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप पर कड़ी नजर रखते थे (Stalking)। सूत्रों के मुताबिक, पीड़ितों को आपत्तिजनक और अश्लील संदेश भेजे जाते थे। इतना ही नहीं, पुलिस उन वीडियो क्लिप्स की भी जांच कर रही है जिन्हें कथित तौर पर आरोपियों ने पीड़ितों को भेजकर उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित या ब्लैकमेल किया था।
निदा खान और अन्य आरोपियों की स्थिति
इस मामले में अब तक कुल 8 लोगों को नामजद किया गया है। पुलिस ने मुस्तैदी दिखाते हुए 7 आरोपियों को पहले ही गिरफ्तार कर लिया है। हालांकि, इस मामले की आठवीं आरोपी, निदा खान, अभी भी फरार बताई जा रही है।
निदा खान ने गिरफ्तारी से बचने के लिए नासिक सत्र न्यायालय में अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) की याचिका दायर की है। निदा के वकीलों, राहुल कासलीवाल और बाबा सैयद का तर्क है कि उसे इस मामले में गलत तरीके से फंसाया गया है। उनके मुताबिक, निदा का कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और वह निर्दोष है। अदालत में इस जमानत याचिका पर जल्द ही सुनवाई होने की उम्मीद है।
कॉर्पोरेट जगत में सुरक्षा पर सवाल
TCS जैसी वैश्विक स्तर की कंपनी के परिसर और उसके कर्मचारियों से जुड़े इस विवाद ने कॉर्पोरेट सुरक्षा और वर्क कल्चर पर बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं।
क्या कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने 'POSH' (पॉश) कानून का सही से पालन हो रहा था?
• क्या मैनेजमेंट को इन गतिविधियों की भनक नहीं थी?
• एक कर्मचारी कैसे दूसरे कर्मचारी पर धार्मिक परिवर्तन का दबाव बनाने की हिम्मत कर सका?
• इन सवालों के जवाब अब पुलिस और कंपनी की आंतरिक जांच कमेटी को तलाशने होंगे।
राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की सक्रियता
मामले की गंभीरता और इसमें शामिल 'धार्मिक दबाव' व 'यौन अपराधों' को देखते हुए राष्ट्रीय महिला आयोग ने मोर्चा संभाल लिया है। आयोग ने इस मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए चार सदस्यीय 'फैक्ट-फाइंडिंग' (तथ्य-खोज) टीम का गठन किया है। यह टीम नासिक जाकर पीड़ितों, पुलिस और कंपनी के अधिकारियों से बात करेगी ताकि सच्चाई सामने आ सके और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिल सके।
नासिक का यह मामला आधुनिक समाज के उस काले चेहरे को दर्शाता है जहां डिजिटल प्लेटफॉर्म और कार्यस्थल का इस्तेमाल शोषण के हथियारों के रूप में किया जाता है। धोखे की बुनियाद पर शुरू हुआ यह सिलसिला अब जेल की सलाखों तक पहुँच चुका है। फिलहाल, नासिक पुलिस साइबर सेल की मदद से डिजिटल सबूतों को इकट्ठा कर रही है ताकि अदालत में आरोपियों के खिलाफ पुख्ता केस तैयार किया जा सके। समाज और प्रशासन के लिए यह एक चेतावनी है कि कार्यस्थलों को सुरक्षित बनाने के लिए केवल नियम पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि उनकी सख्त निगरानी भी अनिवार्य है।