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भारत का परमाणु पुनर्जागरण SMR SHANTI एक्ट और भारत-अमेरिका परमाणु साझेदारी का नया भविष्य

भारत का परमाणु पुनर्जागरण SMR SHANTI एक्ट और भारत-अमेरिका परमाणु साझेदारी का नया भविष्य
 

भारत के नागरिक परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में एक ऐतिहासिक नीतिगत बदलाव और वैश्विक तकनीकी साझेदारी की नई इबारत लिखी जा रही है। नई दिल्ली में सोमवार को केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह और अमेरिका के एक उच्च स्तरीय उद्योग प्रतिनिधिमंडल के बीच हुई द्विपक्षीय बैठक ने भारत के भावी ऊर्जा रोडमैप को एक नई दिशा दे दी है। इस प्रतिनिधिमंडल में अमेरिका के 'न्यूक्लियर एनर्जी इंस्टीट्यूट' (NEI) और 'यूएस-इंडिया स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप फोरम' (USISPF) के शीर्ष नीति निर्माता और कॉर्पोरेट लीडर्स शामिल थे। इस बैठक का मुख्य एजेंडा स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs), उन्नत परमाणु प्रौद्योगिकियों और निजी निवेश के नए रास्ते तलाशना था, जो भारत के 'विकसित भारत @2047' के विजन को गति दे सके।

यह विमर्श केवल दो देशों के बीच की सामान्य व्यावसायिक वार्ता नहीं है, बल्कि यह भारत के उस व्यापक परमाणु मिशन (Nuclear Energy Mission) का हिस्सा है, जिसके तहत देश अपनी परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता को मौजूदा 8.8 गीगावॉट (GW) से बढ़ाकर वर्ष 2047 तक 100 गीगावॉट करने का लक्ष्य रख रहा है। इस विशाल लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारत सरकार ने हाल ही में 'शांति अधिनियम, 2025' (SHANTI Act, 2025) लागू किया है, जिसने दशकों पुराने सरकारी एकाधिकार को समाप्त कर इस संवेदनशील क्षेत्र में निजी और विदेशी निवेश के द्वार खोल दिए हैं।

स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs) परमाणु तकनीक का नया युग

अब तक परमाणु ऊर्जा को विशालकाय संयंत्रों, अरबों डॉलर की अग्रिम लागत और निर्माण में लगने वाले दशकों के समय के रूप में देखा जाता था। लेकिन स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs) ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। ये रिएक्टर पारंपरिक परमाणु संयंत्रों (जो आमतौर पर 700 से 1,000 मेगावाट क्षमता के होते हैं) की तुलना में काफी छोटे होते हैं, जिनकी उत्पादन क्षमता 20 से 300 मेगावाट प्रति यूनिट होती है।

मंत्री जितेंद्र सिंह ने बैठक में इस बात पर विशेष बल दिया कि भारत सरकार SMR तकनीक के विकास और उसकी तैनाती के लिए करीब 20,000 करोड़ रुपये आवंटित कर आगे बढ़ रही है। तकनीकी दृष्टिकोण से SMRs के कई बड़े फायदे हैं। इन्हें कारखानों में ही असेंबल किया जा सकता है और ट्रक या ट्रेन के माध्यम से सीधे साइट पर स्थापित किया जा सकता है। इसके अलावा, इनमें पारंपरिक रिएक्टरों की तरह भारी मात्रा में पानी या विशाल सुरक्षा घेरे की आवश्यकता नहीं होती, जिससे दुर्घटनाओं की संभावना न के बराबर हो जाती है।

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विशेषता पारंपरिक गीगावॉट-स्केल रिएक्टर स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR)
उत्पादन क्षमता 700 MW से 1500 MW प्रति यूनिट 20 MW से 300 MW प्रति यूनिट
निर्माण समय 8 से 12 वर्ष 3 से 5 वर्ष
पूंजीगत लागत (Upfront Cost) अत्यधिक उच्च (एकमुश्त निवेश) कम और चरणबद्ध निवेश संभव
सुरक्षा प्रणालियाँ सक्रिय (Active) सुरक्षा प्रणालियों की आवश्यकता निष्क्रिय (Passive) और स्वतः-सुरक्षित प्रणालियाँ
उपयोगिता केवल ग्रिड-स्केल बेसलोड पावर के लिए रिमोट ग्रिड, भारी उद्योग और हरित हाइड्रोजन उत्पादन

SHANTI एक्ट 2025 नीतिगत सुधारों का गेम-चेंजर

भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में सबसे बड़ी बाधा हमेशा से वर्ष 1962 का परमाणु ऊर्जा अधिनियम रहा है, जो केंद्र सरकार को ही परमाणु संयंत्रों के स्वामित्व और संचालन का अनन्य अधिकार देता था। डॉ. जितेंद्र सिंह ने अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के सामने 'सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया' यानी **SHANTI अधिनियम, 2025** की भूमिका को रेखांकित किया।

यह कानून भारतीय परमाणु इतिहास का सबसे बड़ा विनियामक (Regulatory) सुधार है। इसके तहत अब घरेलू निजी कंपनियों और वैश्विक फॉर्च्यून 500 कंपनियों को भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (जैसे NPCIL) के साथ संयुक्त उद्यम (Joint Ventures) बनाकर परमाणु संयंत्र स्थापित करने की अनुमति मिल गई है। अधिनियम यह सुनिश्चित करता है कि परमाणु ईंधन चक्र (Nuclear Fuel Cycle) और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मामलों पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण रहेगा, लेकिन बुनियादी ढांचे के निर्माण, विनिर्माण और संचालन में निजी पूंजी और दक्षता का लाभ उठाया जा सकेगा।

"ट्रस्ट (TRUST) पहल और शांति (SHANTI) अधिनियम के संयुक्त प्रभाव से भारतीय परमाणु पारिस्थितिकी तंत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव आएगा। हम केवल तकनीक के खरीदार नहीं, बल्कि सह-विकासकर्ता और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के एक मजबूत स्तंभ के रूप में उभर रहे हैं।"
— डॉ. जितेंद्र सिंह, केंद्रीय मंत्री, भारत सरकार

भारत-अमेरिका 'TRUST' पहल और रणनीतिक तकनीकी सहयोग

फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बीच हुई शिखर वार्ता के दौरान लॉन्च की गई **'ट्रस्ट' (TRUST - Transforming Tech Cooperation)** पहल इस नई साझेदारी की रीढ़ है। यह पहल दोनों देशों के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर्स और क्रिटिकल मिनरल्स के साथ-साथ नागरिक परमाणु सहयोग को एक व्यावहारिक व्यापारिक ढांचा प्रदान करती है।

सोमवार को हुई इस उच्च स्तरीय बैठक में दोनों पक्षों ने 'ट्रस्ट' पहल के तहत कई विशिष्ट परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा की:

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  • कोव्वडा AP1000 परियोजना: आंध्र प्रदेश के कोव्वडा में वेस्टिंगहाउस इलेक्ट्रिक कंपनी (WEC) द्वारा प्रस्तावित छह AP1000 परमाणु रिएक्टरों की प्रगति पर गहन चर्चा हुई। यह परियोजना भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के बाद से दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा वाणिज्यिक मील का पत्थर है।
  • AI-सक्षम परमाणु सुरक्षा प्रणालियाँ: परमाणु रिएक्टरों की रीयल-टाइम मॉनिटरिंग, संभावित खतरों की भविष्यवाणी और दक्षता बढ़ाने के लिए मशीन लर्निंग (ML) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग पर सहमति बनी है।
  • फर्मिलैब (Fermilab) साझेदारी: सुपरकंडक्टिंग प्रोटॉन एक्सीलेटर प्रौद्योगिकियों के विकास के लिए भारत के वैज्ञानिकों और अमेरिका की प्रमुख प्रयोगशालाओं के बीच अनुसंधान सहयोग को मजबूत किया जा रहा है।
  • LIGO-India परियोजना: महाराष्ट्र के हिंगोली में स्थापित की जा रही लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल-वेव ऑब्जर्वेटरी (LIGO) परियोजना की प्रगति की भी समीक्षा की गई। यह परियोजना ब्रह्मांडीय तरंगों के अध्ययन के लिए भारत के परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) और अमेरिका के नेशनल साइंस फाउंडेशन (NSF) का एक अनूठा वैज्ञानिक उपक्रम है।

 भारत को 100 गीगावॉट परमाणु क्षमता की आवश्यकता क्यों?

भारत ने पेरिस जलवायु समझौते के तहत वर्ष 2070 तक 'नेट-जीरो' (Net-Zero) उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। वर्तमान में भारत की 70% से अधिक बिजली कोयले से बनती है। हालांकि सौर और पवन ऊर्जा का तेजी से विस्तार हो रहा है, लेकिन वे 'इंटरमिटेंट' (अस्थिर) हैं—अर्थात रात में या हवा न चलने पर वे बिजली नहीं दे सकते। ग्रिड की स्थिरता और बेसलोड पावर (सतत बिजली) के लिए परमाणु ऊर्जा ही एकमात्र कार्बन-मुक्त और विश्वसनीय विकल्प है। 100 गीगावॉट का लक्ष्य हासिल करने से भारत की कोयले पर निर्भरता लगभग आधी हो जाएगी।

देश और आम जनता पर क्या होगा असर?

इस मेगा-डील और नीतिगत बदलावों का सीधा असर भारत के आम नागरिकों और देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। सबसे पहला लाभ **ऊर्जा सुरक्षा और निर्बाध बिजली** के रूप में दिखेगा। SMRs को देश के उन सुदूर हिस्सों या औद्योगिक क्षेत्रों के पास स्थापित किया जा सकेगा जहाँ ग्रिड लाइनें कमजोर हैं। इससे डेटा सेंटर्स, कपड़ा मिलों और भारी इस्पात उद्योगों को 24 घंटे बिना किसी व्यवधान के स्वच्छ ऊर्जा मिल सकेगी, जिससे अंततः आम उपभोक्ताओं के लिए भी बिजली की दरें स्थिर होंगी।

दूसरा बड़ा प्रभाव **रोजगार सृजन और स्वदेशी विनिर्माण (Make in India)** पर पड़ेगा। ₹20,000 करोड़ के शुरुआती बजटीय आवंटन और अमेरिकी कंपनियों के साथ तकनीकी हस्तांतरण (Technology Transfer) से भारत में न्यूक्लियर-ग्रेड उपकरणों के निर्माण के लिए एक नया इकोसिस्टम तैयार होगा। इससे उच्च-कुशल इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और निर्माण क्षेत्र में लाखों अप्रत्यक्ष नौकरियों के अवसर पैदा होंगे।

वैश्विक भू-राजनीति और विश्व पटल पर प्रभाव

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, यह साझेदारी वैश्विक परमाणु आपूर्ति श्रृंखला (Global Nuclear Supply Chain) के संतुलन को बदलने की क्षमता रखती है। वर्तमान में, वैश्विक परमाणु बाजार और विशेष रूप से SMR तकनीक के विकास में रूस (रोसाटॉम) और चीन का काफी दबदबा है। भारत और अमेरिका का यह गठजोड़ लोकतांत्रिक देशों के नेतृत्व में एक **सुरक्षित और लचीली आपूर्ति श्रृंखला (Resilient Supply Chain)** का निर्माण करेगा, जो विकासशील देशों को एक विश्वसनीय विकल्प प्रदान कर सकेगा।

इसके अतिरिक्त, भारत की 'दुर्लभ पृथ्वी' (Rare Earth Elements) और क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र में अमेरिका के साथ बढ़ती जुगलबंदी चीन के इस क्षेत्र में एकाधिकार को कड़ी चुनौती देगी। यह कदम भारत को वैश्विक मंच पर केवल एक बड़े बाजार के रूप में नहीं, बल्कि परमाणु तकनीक के एक बड़े निर्यातक देश के रूप में स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम है।

निष्कर्ष और आगे की राह

सोमवार को नई दिल्ली में संपन्न हुई यह बैठक इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत अब परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में अपनी 'रणनीतिक झिझक' को पीछे छोड़ चुका है। 2047 तक 100 गीगावॉट क्षमता प्राप्त करने का मार्ग निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण है, जिसके लिए लगभग ₹20 लाख करोड़ के निवेश और कड़े सुरक्षा मानकों की आवश्यकता होगी।

हालांकि, शांति अधिनियम, 2025 के रूप में घरेलू नीतिगत सुधार और अमेरिका के साथ 'ट्रस्ट' पहल के तहत अंतरराष्ट्रीय सहयोग ने वह मजबूत आधारशिला रख दी है, जिसकी देश को सख्त जरूरत थी। यदि भारत इन परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से क्रियान्वित करने में सफल रहता है, तो यह न केवल भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता सुनिश्चित करेगा, बल्कि वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा क्रांति का नेतृत्व भी भारत के हाथों में सौंप देगा।

 

All photos source: DDNEWS

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