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चम्पावत केस में बड़ा U-Turn — मेडिकल रिपोर्ट में दुष्कर्म की पुष्टि नहीं, CCTV और फॉरेंसिक ने पलटी कहानी, कथित पीड़िता पर भी केस संभव

चम्पावत केस में बड़ा U-Turn — मेडिकल रिपोर्ट में दुष्कर्म की पुष्टि नहीं, CCTV और फॉरेंसिक ने पलटी कहानी, कथित पीड़िता पर भी केस संभव

चम्पावत 8 मई। उत्तराखंड के चम्पावत में जिस मामले ने दो दिन पहले पूरे प्रदेश में हड़कंप मचाया था उसमें आज सुबह पुलिस ने एक बड़ा खुलासा किया। पुलिस अधीक्षक रेखा यादव ने प्रेस वार्ता में कहा कि नाबालिग के साथ दुष्कर्म की घटना हुई ही नहीं थी। पूरा मामला एक सुनियोजित षड्यंत्र था।

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एसपी रेखा यादव ने कहा नाबालिग के साथ किसी भी प्रकार की दुष्कर्म की कोई भी घटना नहीं हुई थी। पूरा मामला कमल रावत द्वारा बदले की भावना से प्रेरित होकर अपनी महिला मित्र के साथ मिलकर रचा गया था। 

अब सवाल यह है — जो तीन लोगों पर POCSO और दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज हुआ था, उनका क्या होगा? और क्या कथित पीड़िता और उसके पिता पर भी झूठी शिकायत का केस दर्ज होगा?

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6 मई से 8 मई  दो दिन में कैसे पलटा पूरा मामला

पीड़िता के पिता की तहरीर पर पुलिस ने तीन आरोपियों  कमल रावत, विनोद और एक अन्य  पर POCSO Act के तहत मुकदमा दर्ज किया था। 10 सदस्यीय SIT गठित हुई। एसपी रेखा यादव ने खुद पीड़िता से बात की और घटनास्थल का मुआयना किया।

7 मई को

मेडिकल रिपोर्ट आई। मेडिकल रिपोर्ट में सामूहिक दुष्कर्म की पुष्टि नहीं हुई। CCTV फुटेज खंगाली गई। फॉरेंसिक टीम ने घटनास्थल की वैज्ञानिक जाँच की।

8 मई को

सबसे बड़ा खुलासा यह हुआ कि जिन तीन लोगों को नामजद आरोपी बनाया गया था, वे घटना के समय मौके पर मौजूद ही नहीं थे। डिजिटल और फॉरेंसिक सबूत इस बात की पुष्टि कर रहे हैं। 

साजिश कैसे रची गई  पुलिस ने बताया पूरा तरीका

कमल रावत द्वारा बदले की भावना से प्रेरित होकर एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत नाबालिग बालिका को झूठा प्रलोभन और बहला-फुसलाकर पूरा घटनाक्रम रचा गया था। 

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पुलिस के अनुसार नाबालिग को पिता के इलाज का झाँसा देकर इस साजिश में शामिल किया गया। वह अपनी मर्जी से दोस्त के साथ गई थी  न उसे बंधक बनाया गया, न उसके साथ दुष्कर्म हुआ।

पुलिस को संदेह है कि पूरे घटनाक्रम को बदले की भावना से रचा गया। कमल रावत का नाम साजिश रचने वाले के रूप में सामने आया है। 

नाबालिग का बयान  क्या कहा उसने

 पुलिस जाँच के दौरान नाबालिग का बयान सामने आया है जिसमें उसने अपने पक्ष की बात रखी है। पुलिस इस बयान को मेडिकल रिपोर्ट और फॉरेंसिक साक्ष्यों के साथ मिलाकर देख रही है। फिलहाल मामला जाँच के दायरे में है और किसी भी अंतिम निष्कर्ष से पहले सभी पहलुओं को देखा जा रहा है।

कथित पीड़िता पर भी केस  कानून क्या कहता है

अब जो सबसे बड़ा सवाल है क्या कथित पीड़िता और उसके पिता पर झूठी शिकायत का मुकदमा दर्ज होगा?

पुलिस ने साफ कहा है कि यदि झूठे आरोप लगाने की पुष्टि होती है तो संबंधित लोगों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

भारतीय कानून में झूठी शिकायत दर्ज कराने पर IPC की धारा 182 और 211 के तहत मुकदमा हो सकता है। POCSO Act के तहत झूठी शिकायत पर भी कार्रवाई का प्रावधान है।

लेकिन यहाँ एक पेचीदगी है — नाबालिग पर सीधे मुकदमा नहीं हो सकता। पिता की भूमिका की जाँच होगी।

कांग्रेस का रुख बदला — जाँच की सराहना भी, माँग भी

कांग्रेस प्रदेश सचिव आनंद मेहरा ने कहा कि विपक्ष होने के नाते उनका दायित्व था कि वो पीड़ित पक्ष से मिलें और पुलिस से निष्पक्ष जाँच की माँग करें।

उन्होंने आगे कहा — "यदि पुलिस जाँच में यह मामला साजिश के तहत पाया जाता है तो यह बेहद गंभीर विषय है। किसी को फँसाने के लिए बहन-बेटियों का इस्तेमाल करना देवभूमि की संस्कृति के खिलाफ है।"

उन्होंने पुलिस विभाग की सराहना करते हुए कहा कि जाँच के खुलासे सराहनीय हैं लेकिन न्याय तभी पूरा होगा जब हर पहलू की पारदर्शी जाँच हो।

तीन आरोपियों का क्या होगा

अब सबसे अहम सवाल — जिन तीन लोगों पर POCSO Act के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था, उनका क्या होगा?

डिजिटल और फॉरेंसिक साक्ष्यों से पता चला है कि तीनों नामजद आरोपी घटना के समय मौके पर थे ही नहीं।  अगर जाँच में यह पूरी तरह साबित हो जाता है तो इन तीनों का मुकदमा रद्द हो सकता है।

एक आरोपी अग्निवीर योजना के तहत सेना में है। उसके पिता राम सिंह ने पहले ही वीडियो जारी कर कहा था  "मेरा बेटा निर्दोष है। अगर दोषी निकले तो फाँसी दो  लेकिन निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।

चम्पावत पुलिस की भूमिका  त्वरित और तकनीकी जाँच

इस पूरे मामले में चम्पावत पुलिस की भूमिका उल्लेखनीय रही।

6 मई को शिकायत मिलते ही FIR दर्ज की। नाबालिग को तुरंत बरामद किया। मेडिकल जाँच कराई। 10 सदस्यीय SIT बनाई। RFSL उधम सिंह नगर की फील्ड यूनिट को मौके पर बुलाकर वैज्ञानिक जाँच कराई। CCTV फुटेज खंगाली। पीड़िता का CWC के सामने परामर्श और न्यायालय के सामने बयान दर्ज कराया। जिलाधिकारी से पत्राचार कर एक मजिस्ट्रेट नाबालिग की देखरेख के लिए नियुक्त किया। 

दो दिन में तकनीकी और वैज्ञानिक जाँच के आधार पर पूरी कहानी पलट दी यह तेज और पारदर्शी जाँच का उदाहरण है।

यह मामला क्यों जरूरी सबक है

यह मामला दो अलग-अलग खतरों की तरफ ध्यान दिलाता है।

पहला खतरा  अगर पुलिस तुरंत तकनीकी जाँच न करती तो तीन निर्दोष लोग POCSO जैसे गंभीर आरोप में जेल जा सकते थे। एक अग्निवीर का सैन्य करियर बर्बाद हो सकता था। दूसरा खतरा झूठे दुष्कर्म के मामले असली पीड़िताओं के लिए न्याय की राह कठिन बनाते हैं। जब झूठे मामले सामने आते हैं तो समाज में असली पीड़िताओं पर भी संदेह होने लगता है।

जाँच अभी जारी  अंतिम निष्कर्ष बाकी

मामले की विस्तृत जाँच अभी जारी है। पुलिस सभी साक्ष्यों की बारीकी से परीक्षण कर रही है।  साजिश में शामिल लोगों की पहचान और उनके खिलाफ कार्रवाई आने वाले दिनों में होगी। पूरे उत्तराखंड की नजर इस जाँच के अंतिम निष्कर्ष पर टिकी है।

Admin Desk

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