बॉलीवुड में जहाँ एक तरफ रणवीर सिंह अभिनीत फिल्म धुरंधर: द रिवेंज के दूसरे भाग ने बॉक्स ऑफिस पर 1,300 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई कर इतिहास रचा है, वहीं पर्दे के पीछे एक गहरी कानूनी लड़ाई चल रही है जो केवल एक गाने की नहीं, बल्कि रचनाकार की पहचान, स्वाभिमान और बौद्धिक संपदा के अधिकार की लड़ाई है। दिल्ली उच्च न्यायालय में बुधवार को यह सूचित किया गया कि ट्रायमूर्ति फिल्म्स और धुरंधर-2 के निर्माताओं के बीच मध्यस्थता के माध्यम से समझौते का प्रयास पूरी तरह विफल हो गया है। अब यह मामला विधिवत मुकदमे के रूप में आगे बढ़ेगा, और अगली सुनवाई 8 मई को निर्धारित की गई है।
वह गाना जो तीन दशकों बाद भी ज़िंदा है
1989 में जब निर्देशक राजीव राय ने त्रिदेव बनाई थी, तो उन्हें शायद अंदाज़ा न रहा होगा कि उनकी फिल्म का एक गाना तिरछी टोपीवाले' तीन दशकों बाद भी इतना जीवंत रहेगा कि उस पर कानूनी विवाद उठे। कल्याणजी-आनंदजी के संगीत और अमित कुमार व सपना मुखर्जी की आवाज़ में सजे इस गाने ने उस दौर में धूम मचाई थी। यह गाना केवल एक गाना नहीं था यह एक सांस्कृतिक प्रतीक बन गया था, जो उस युग की मस्ती, बेफ़िक्री और बॉलीवुड के सुनहरे दौर की पहचान था।
धुरंधर-2 में इसी गाने को 'रंग दे लाल' के नाम से पुनर्जीवित किया गया नए बोल, नई आवाज़, और संगीतकार शशांक सचदेव का रिमिक्स। फिल्म के क्लाइमेक्स में राकेश बेदी के किरदार पर यह दृश्य फिल्माया गया। लेकिन राजीव राय और ट्रायमूर्ति फिल्म्स के अनुसार, यह सब उनकी अनुमति के बिना हुआ।
राजीव राय की पीड़ा यह चोरी है दोहरी चोरी है
राजीव राय ने इस विवाद पर खुलकर अपनी भावनाएँ व्यक्त की हैं। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा यह चोरी है। यह पूरी चोरी बन जाती है। और आप इसको दूसरी पिक्चर में डालते हैं, alter करके, तो वो double chori है।" mid-day को दिए एक अन्य साक्षात्कार में उनकी पीड़ा और गहरी दिखी उन्होंने ओये ओये को mutilate किया है, और युवा निर्माता [धर] अनजान बनते हैं। उन्होंने हद पार कर दी। उनका ज़मीर कहाँ है?
यह केवल आर्थिक क्षतिपूर्ति का सवाल नहीं है। राजीव राय के लिए यह उनकी रचना के साथ हुआ अपमान है एक ऐसा घाव जो पैसों से नहीं भरता। दिल्ली उच्च न्यायालय ने उन्हें यह भी निर्देश दिया कि जब तक मामला न्यायालय के अधीन है, वे प्रतिवादियों के विरुद्ध सार्वजनिक रूप से आरोप न लगाएँ।
मुकदमे का कानूनी ढाँचा कौन किसके विरुद्ध?
यह मामला कॉपीराइट कानून की कई जटिल परतों को उजागर करता है। ट्रायमूर्ति फिल्म्स ने जियो स्टूडियोज़ और बी62 स्टूडियोज़ के विरुद्ध वाद दायर किया है। उनका तर्क है कि वे मूल धुन के संगीत कार्य और ध्वनि रिकॉर्डिंग दोनों पर अधिकार रखते हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि गाने का उपयोग फिल्म की थिएटर रिलीज़, प्रमोशन और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रसारण सभी में उनकी अनुमति के बिना हुआ, जो कॉपीराइट उल्लंघन की श्रेणी में आता है।
दूसरी तरफ, धुरंधर-2 के संगीत अधिकार रखने वाली सुपर कैसेट्स इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड (T-Series) ने पलटवार करते हुए कहा कि ट्रायमूर्ति न्यायालय के समक्ष पूरी तरह पारदर्शी नहीं रही। उनका तर्क है कि त्रिदेव के गाने पहले भी कई फिल्मों में उपयोग होते रहे हैं, और ट्रायमूर्ति ने उन मिसालों को नज़रअंदाज़ किया।
मध्यस्थता क्यों विफल हुई ? विशेषज्ञ दृष्टिकोण
जब भी दो पक्षों के बीच मध्यस्थता विफल होती है, तो इसके पीछे आमतौर पर तीन कारण होते हैं आर्थिक मुआवज़े पर असहमति, भविष्य के उपयोग के अधिकारों पर टकराव, और सिद्धांत का प्रश्न। इस मामले में तीनों कारण संभावित हैं।
राजीव राय के लिए यह मामला केवल रॉयल्टी का नहीं है यह उनकी विरासत का प्रश्न है। वहीं धुरंधर-2 के निर्माताओं के लिए, जिनकी फिल्म पहले ही अभूतपूर्व सफलता हासिल कर चुकी है, किसी भी समझौते के शर्तें व्यावसायिक दृष्टि से संवेदनशील हो सकती हैं। इसके अतिरिक्त, T-Series के हस्तक्षेप ने मामले को और जटिल बना दिया क्योंकि अब यह केवल दो पक्षों की नहीं, बल्कि तीन परस्पर विरोधी दावों की लड़ाई है।
बॉलीवुड
यह विवाद एक व्यापक और गंभीर प्रश्न उठाता है जो पिछले कुछ वर्षों में बॉलीवुड में बार-बार सामने आया है क्या रीमिक्स और रीक्रिएशन की आड़ में मूल रचनाकारों के अधिकारों का हनन हो रहा है?
बीते एक दशक में हिंदी सिनेमा में पुराने सुपरहिट गानों को नए रूप में पेश करने की प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ी है। निर्माताओं का तर्क होता है कि नॉस्टैल्जिया दर्शकों को खींचता है। लेकिन इस प्रक्रिया में कभी-कभी मूल संगीतकारों, गीतकारों या प्रोडक्शन हाउसेज़ के अधिकारों की अनदेखी हो जाती है या जानबूझकर की जाती है। धुरंधर-2 बनाम ट्रायमूर्ति का यह मामला इस प्रवृत्ति पर एक कड़ा सवाल है।
कानूनी प्रतिनिधित्व दिग्गज वकीलों की फौज़
इस मामले की गंभीरता इस बात से भी ज़ाहिर होती है कि दोनों पक्षों ने देश के शीर्ष कानूनी विशेषज्ञों को अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया है। सुपर कैसेट्स की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अखिल सिब्बल, आदित्य गुप्ता, असावरी जैन, गीतांजलि विश्वनाथन और शिवांश तिवारी उपस्थित हैं। बी62 फिल्म्स का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता रवि प्रकाश कुमार के साथ पराग खांडहर, चंद्रिमा मित्रा, अनाहिता वर्मा, कृष्ण कुमार और दीवा चांचानी कर रहे हैं। जियो स्टूडियोज़ की ओर से विशेष इस्सर, राहुल धवन, अपूर्व बंसल और वैशाली सिंह अदालत में पेश हैं।
आगे क्या? न्यायालय की भूमिका और संभावित परिणाम
8 मई की सुनवाई में न्यायालय यह तय करेगा कि मुकदमा किस दिशा में आगे बढ़ेगा। कानूनी जानकारों के अनुसार, यदि ट्रायमूर्ति अपने स्वामित्व और लाइसेंस की अनुपस्थिति को साबित करने में सफल रहते हैं, तो यह मामला भारतीय कॉपीराइट अधिनियम, 1957 की धारा 51 के तहत उल्लंघन का ठोस उदाहरण बन सकता है। इसके परिणामस्वरूप न केवल आर्थिक हर्जाना, बल्कि भविष्य में गाने के उपयोग पर स्थायी प्रतिबंध भी संभव है।
दूसरी ओर, यदि सुपर कैसेट्स यह साबित कर पाती है कि ट्रायमूर्ति ने पूर्व में अन्य फिल्मों को इसी प्रकार अनुमति दी थी, तो न्यायालय का फ़ैसला अलग दिशा में जा सकता है।
दिल्ली उच्च न्यायालय का फ़ैसला जो भी आए, यह मामला बॉलीवुड के लिए एक स्थायी चेतावनी बन चुका है रचनाकार की अनुमति और उचित लाइसेंसिंग केवल कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि नैतिक ज़िम्मेदारी भी है।