नई दिल्ली | भारत का इलेक्ट्रिक वाहन बाज़ार अब सिर्फ सरकारी सब्सिडी और नीतियों पर नहीं चल रहा। यह एक असली औद्योगिक क्रांति की तरफ बढ़ रहा है। इंडिया एनर्जी स्टोरेज अलायंस (IESA) की नई रिपोर्ट के मुताबिक, देश में EV बैटरी की मांग 2025 के 20 गीगावाट-घंटा से बढ़कर 2032 तक 200 गीगावाट-घंटा हो जाएगी यानी सिर्फ 7 साल में 10 गुना उछाल।
लेकिन असली सवाल यह है — क्या भारत इस मौके को भुना पाएगा? या सिर्फ आंकड़ों में बड़ा बनकर रह जाएगा?
10 गुना मांग — लेकिन यह सिर्फ शुरुआत है
2025 में भारत में 25 लाख से ज़्यादा EV बिके। इनमें 15 लाख दोपहिया और 7 लाख तिपहिया वाहन थे। अभी तक दोपहिया EV बाज़ार की अगुवाई कर रहे हैं क्योंकि ये सस्ते हैं, शहरों में आसान हैं, और आम आदमी की पहुंच में हैं।
लेकिन IESA रिपोर्ट कहती है कि असली धमाका अभी आना बाकी है। आने वाले वर्षों में इलेक्ट्रिक कारें और हल्के कमर्शियल वाहन बाज़ार की रफ्तार को कई गुना बढ़ाएंगे। डिलीवरी नेटवर्क, फैमिली कार सेगमेंट यही अगला बड़ा मोर्चा है।
सिर्फ गाड़ी नहीं असली मौका कहां है
यहां एक ज़रूरी बात समझनी होगी जो ज़्यादातर खबरें नहीं बताती। EV बेचना बड़ा बिज़नेस है लेकिन EV बनाने के लिए जो चाहिए, वो बनाना उससे भी बड़ा बिज़नेस है।
IESA साफ कहती है — भारत के लिए असली अवसर बैटरी, मोटर, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और कलपुर्जों के लोकल मैन्युफैक्चरिंग में है। अगर भारत यह सप्लाई चेन खुद बना ले, तो दुनिया का नया EV मैन्युफैक्चरिंग हब बन सकता है।
चीन से दूर हटना चाहती कई ग्लोबल कंपनियां अभी भारत को इसी नज़र से देख रही हैं।
बैटरी टेक्नोलॉजी — क्या बदल रहा है
अभी दोपहिया EV में NMC (निकेल मैंगनीज कोबाल्ट) बैटरी का 70% हिस्सा है। लेकिन LFP (लिथियम आयरन फॉस्फेट) बैटरी तेज़ी से आगे आ रही है सुरक्षित है, लंबी चलती है, और सस्ती है।
भविष्य में तीन और टेक्नोलॉजी आएंगी जो खेल बदल सकती हैं।
LMFP (लिथियम मैंगनीज आयरन फॉस्फेट) — LFP से बेहतर रेंज, कम लागत।
Sodium-Ion — लिथियम की ज़रूरत नहीं, सस्ती और भारत के लिए बेहद फायदेमंद।
Solid-State — सबसे एडवांस्ड, सबसे महंगी लेकिन 2030 के बाद गेमचेंजर बन सकती है। 2030 तक यह पूरा बैटरी बाज़ार $19 बिलियन से ज़्यादा का हो सकता है।
मोटर टेक्नोलॉजी — जो कोई नहीं बताता
EV की बात होती है तो बैटरी पर ही सब रुक जाते हैं। मोटर की बात कम होती है।
लेकिन मोटर उतनी ही ज़रूरी है। अभी दोपहिया EV में BLDC मोटर का 71% बाज़ार है। यात्री कारों में PMSM मोटर की हिस्सेदारी 90% से ज़्यादा है। यह मोटर सेगमेंट भी लोकल मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा मौका है और अभी तक इस पर उतना ध्यान नहीं गया।
सरकार क्या कर रही है
FAME II स्कीम और PLI (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) के ज़रिए सरकार लोकल बैटरी और EV कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दे रही है। आने वाले वर्षों में बैटरी प्लांट्स और EV कंपोनेंट इंडस्ट्री में बड़े निवेश की उम्मीद है।
लक्ष्य साफ है — चीन से आयात पर निर्भरता कम करना और खुद बनाना।
चुनौतियां जो रास्ते में हैं
सब कुछ इतना आसान नहीं है।
चीन पर निर्भरता अभी भी बड़ी समस्या है। भारत अभी भी लिथियम-आयन सेल के लिए बड़े पैमाने पर चीन से आयात करता है। ग्लोबल सप्लाई में कोई रुकावट आई तो मुश्किल होगी। चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर अभी भी कमज़ोर है। बड़े शहरों से बाहर निकलते ही चार्जिंग स्टेशन ढूंढना मुश्किल है। कीमत अभी भी ज़्यादा है। EV खरीदने की शुरुआती लागत आम ग्राहक के लिए अभी भी बड़ी बाधा है। LFP बैटरी की रेंज कम है। लंबी दूरी के सफर के लिए यह अभी पूरी तरह तैयार नहीं।
IESA रिपोर्ट कब आएगी
यह पूरी रिपोर्ट 8 से 10 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में होने वाले 12वें भारत ऊर्जा भंडारण सप्ताह में जारी होगी। इसे IESA और Customized Energy Solutions (CES) ने मिलकर तैयार किया है।
भारत का असली मौका 2034 तक की तस्वीर
IESA के अध्यक्ष देबमाल्य सेन के शब्दों में — "यह ग्रोथ तभी टिकेगी जब लोकल बैटरी मैन्युफैक्चरिंग, नई टेक्नोलॉजी और मज़बूत सप्लाई नेटवर्क पर तेज़ी से काम होगा।" रिपोर्ट में 2034 तक की संभावनाओं का विश्लेषण किया गया है। बैटरी, कंपोनेंट और सप्लाई चेन तीनों में भारत अगर सही कदम उठाए तो दुनिया का नया EV हब बन सकता है। 10 गुना मांग सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है। यह एक मौका है। सवाल यह है कि भारत इसे पकड़ पाता है या नहीं।