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2048 तक कैंसर-मुक्त हो सकते हैं अमीर देश लेकिन भारत जैसे देशों में खतरा 40 गुना बढ़ेगा

2048 तक कैंसर-मुक्त हो सकते हैं अमीर देश लेकिन भारत जैसे देशों में खतरा 40 गुना बढ़ेगा

द लैंसेट की रिपोर्ट का खुलासा  सर्वाइकल कैंसर में अमीर और गरीब देशों के बीच की खाई इस सदी में हो सकती है 12 गुना, जानें भारत को अभी क्या करना होगा एक तरफ कनाडा जैसे देश हैं जो 2048 तक सर्वाइकल कैंसर को पूरी तरह खत्म कर देंगे। दूसरी तरफ भारत जैसे निम्न और मध्यम आय वाले देश हैं जहाँ इस सदी के अंत तक यह खतरा कनाडा से 40 गुना ज़्यादा हो सकता है। यह चेतावनी किसी छोटी रिपोर्ट की नहीं — दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल द लैंसेट की है। और यह चेतावनी अभी है, जब वक्त है कुछ करने का।

क्या कहती है द लैंसेट की रिपोर्ट ?

यूनिवर्सिते लावल और सीएचयू डे क्यूबेक रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों ने यह रिपोर्ट तैयार की है। प्रोफेसर मार्क ब्रिसन जिन्होंने इस अध्ययन का नेतृत्व किया, उनका कहना है — अभी निम्न आय वाले देशों में सर्वाइकल कैंसर की दर अमीर देशों से 3 गुना ज़्यादा है। लेकिन अगर एचपीवी टीकाकरण की रफ्तार ऐसी ही रही तो इस सदी के अंत तक यह अंतर 12 गुना हो जाएगा। और कनाडा जैसे देशों की तुलना में तो यह 40 गुना तक पहुँच सकता है।

यह सिर्फ एक आँकड़ा नहीं है यह लाखों महिलाओं की ज़िंदगी का सवाल है।

सर्वाइकल कैंसर है क्या और इसका कारण क्या है? सर्वाइकल कैंसर यानी गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार इसके लगभग सभी मामलों की जड़ में एक वायरस है ह्यूमन पैपिलोमावायरस यानी एचपीवी। यह वायरस यौन गतिविधि के ज़रिए फैलता है और लंबे समय तक शरीर में रहे तो कैंसर बन सकता है।

अच्छी खबर यह है कि यह कैंसर पूरी तरह रोका जा सकता है  एचपीवी वैक्सीन और नियमित जांच से। लेकिन बुरी खबर यह है कि भारत समेत कई देशों में इन दोनों की पहुँच बेहद सीमित है।

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विश्व स्वास्थ्य संगठन का 90-70-90 लक्ष्य क्या है यह फॉर्मूला ?

2020 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सर्वाइकल कैंसर खत्म करने का एक वैश्विक योजना बनाया। इसे 90-70-90 रणनीति कहते हैं। इसके मुताबिक 90% लड़कियों को 15 साल की उम्र से पहले एचपीवी वैक्सीन लगनी चाहिए। 70% महिलाओं की 35 और 45 साल की उम्र में उच्च गुणवत्ता वाली जांच होनी चाहिए। और 90% प्री-कैंसरस मामलों और कैंसर का इलाज होना चाहिए।

अमीर देश इस लक्ष्य पर हैं। लेकिन भारत जैसे देश अभी भी इससे बहुत पीछे हैं।

भारत में सर्वाइकल कैंसर महिलाओं में दूसरा सबसे आम कैंसर है। हर साल लगभग 1,25,000 नए मामले सामने आते हैं और 77,000 से ज़्यादा महिलाएँ इससे जान गंवाती हैं। यानी हर घंटे लगभग 9 महिलाएँ। यह वो कैंसर है जो ज़्यादातर 30 से 50 साल की कामकाजी उम्र की महिलाओं को होता है  जो परिवार की रीढ़ होती हैं। श्रीलंका के आँकड़े भी चिंताजनक हैं हर साल 1,400 नए मामले 800 मौतें। वहाँ की डॉक्टर नादीजा हेराथ कहती हैं यह एक अत्यधिक रोके जा सकने वाली बीमारी है। जल्दी पहचान से इसे रोका जा सकता है — लेकिन जागरूकता और संसाधन दोनों चाहिए।

क्या है समाधान वैज्ञानिकों ने क्या सुझाया ?

द लैंसेट अध्ययन में शोधकर्ताओं ने कई परिदृश्यों का मॉडल तैयार किया। सबसे असरदार रणनीति वो निकली जिसमें विश्व स्वास्थ्य संगठन के लक्ष्यों के साथ-साथ लड़के और लड़कियाँ दोनों को एचपीवी वैक्सीन दी जाए और कैच-अप अभियान चलाए जाएं यानी जिन किशोरों और युवाओं को पहले वैक्सीन नहीं मिली उन्हें भी शामिल किया जाए। इस रणनीति से इस सदी के अंत तक 37 मिलियन यानी 3.7 करोड़ कैंसर मामलों को रोका जा सकता है।

महामारी विज्ञानी मेलानी ड्रॉले कहती हैं अच्छी खबर यह है कि नए सस्ते वैक्सीन बाज़ार में आए हैं। दो की जगह एक डोज भी काम कर सकती है  इससे लागत कम होगी और ज़्यादा लोगों तक पहुँच बनेगी।

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  देरी का असली खतरा

प्रोफेसर ब्रिसन ने एक बात कही जो हर सरकार को सुननी चाहिए अगर हम विश्व स्वास्थ्य संगठन के लक्ष्य 5 साल बाद पूरे करते हैं तो टीकाकरण के फायदे भी 5 साल बाद मिलेंगे। इस बीच लाखों लड़कियाँ एचपीवी से संक्रमित होंगी, कैंसर विकसित करेंगी और जान गंवा सकती हैं। यानी हर एक साल की देरी का मतलब है  हज़ारों ज़िंदगियाँ।

भारत को अभी क्या करना होगा ?

पहला  एचपीवी टीकाकरण को स्कूल कार्यक्रम में शामिल करो। लड़कियों के साथ लड़कों को भी। सरकार ने 2023 में यह शुरू किया था लेकिन कवरेज अभी भी बहुत कम है।

दूसरा  जांच को ग्रामीण इलाकों तक पहुँचाओ। शहरों में पैप स्मीयर और एचपीवी डीएनए जांच उपलब्ध है लेकिन गाँव की महिलाएँ अभी भी इससे वंचित हैं।

तीसरा  जागरूकता बढ़ाओ। भारत में अभी भी बड़ी तादाद में महिलाएँ एचपीवी वैक्सीन के बारे में नहीं जानतीं।

चौथा  अंतरराष्ट्रीय फंडिंग लाओ। यह अकेला भारत का काम नहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन और वैश्विक संस्थाओं को फंडिंग देनी होगी।

Admin Desk

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