नई दिल्ली। अफ्रीका के डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) और युगांडा में इबोला वायरस डिजीज (Ebola Virus Disease - EVD) के नए प्रकोप ने वैश्विक स्वास्थ्य संगठनों की चिंता बढ़ा दी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा इसे 'पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी ऑफ इंटरनेशनल Concern' (PHEIC) घोषित किए जाने के बाद, भारत सरकार के केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) ने देश में सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था को कड़ा कर दिया है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (NCDC), इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम (IDSP) और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) के साथ मिलकर एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक की है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान में भारत में इबोला का कोई मामला नहीं है और देश के लिए जोखिम "न्यूनतम" है, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए देश के सभी प्रवेश द्वारों (Airports and Ports) पर निगरानी को उच्चतम स्तर पर ले जाया गया है।
बुंडिबुग्यो स्ट्रेन (Bundibugyo Strain): कितना खतरनाक है यह वायरस?
इबोला वायरस के कई स्ट्रेन हैं, जिनमें 'जायरे' (Zaire) और 'सूडान' (Sudan) स्ट्रेन को अतीत में सबसे घातक माना गया है। वर्तमान में कांगो और युगांडा में जिस स्ट्रेन का प्रकोप देखा जा रहा है, उसे 'बुंडिबुग्यो इबोलावायरस' (Bundibugyo ebolavirus - BDBV) कहा जाता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस स्ट्रेन के बारे में निम्नलिखित बातें महत्वपूर्ण हैं:
- उत्पत्ति और इतिहास: बुंडिबुग्यो स्ट्रेन की पहचान पहली बार साल 2007 में युगांडा के बुंडिबुग्यो जिले में हुई थी। उस समय इस आउटब्रेक में लगभग 149 मामले सामने आए थे और मृत्यु दर लगभग 25% रही थी।
- मृत्यु दर (Mortality Rate): जायरे स्ट्रेन की तुलना में (जिसमें मृत्यु दर 60% से 90% तक हो सकती है), बुंडिबुग्यो स्ट्रेन की मृत्यु दर ऐतिहासिक रूप से 25% से 34% के बीच दर्ज की गई है। हालांकि, यह दर भी जनस्वास्थ्य के लिहाज से बेहद खतरनाक मानी जाती है।
- प्राकृतिक भंडार (Natural Reservoir): अफ्रीका सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (Africa CDC) के अनुसार, कांगो के घने उष्णकटिबंधीय जंगल (Dense Tropical Forests) इबोला वायरस के प्राकृतिक घर माने जाते हैं। यहाँ पाए जाने वाले फ्रूट बैट्स (Pteropodidae परिवार के चमगादड़) को इस वायरस का मुख्य वाहक माना जाता है।
वैश्विक स्थिति: कांगो और युगांडा से आ रहे ताजा आंकड़े
अफ्रीका महाद्वीप पर स्थिति तेजी से बदल रही है। अफ्रीका सर्विलांस डेटा के अनुसार, कांगो की राजधानी किंशासा (Kinshasa) में हाल ही में एक प्रयोगशाला-पुष्टि (Laboratory-Confirmed) संदिग्ध मामला सामने आया था, जिससे घबराहट फैल गई थी। हालांकि, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने रविवार को राहत भरी जानकारी साझा करते हुए बताया कि सेकेंडरी टेस्टिंग (दूसरी जांच) के बाद उस मरीज की रिपोर्ट नेगेटिव आई है।
इसके बावजूद, स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अफ्रीका सीडीसी (Africa CDC) के महानिदेशक जीन कासेया (Jean Kaseya) ने एक आधिकारिक बयान जारी किया है। उन्होंने बताया कि उन्होंने इस आउटब्रेक को 'महाद्वीपीय सुरक्षा की सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल' (Public Health Emergency of Continental Security) घोषित करने की संभावना पर तकनीकी मार्गदर्शन और सिफारिशें मांगी हैं। यदि ऐसा होता है, तो पूरे अफ्रीका महाद्वीप में यात्रा और चिकित्सा संसाधनों को लेकर सख्त नियम लागू हो जाएंगे।
WHO की सख्त ट्रैवल गाइडलाइन: 21 दिनों का आइसोलेशन
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर वायरस के फैलाव को रोकने के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं:
- अंतरराष्ट्रीय यात्रा पर प्रतिबंध: कोई भी व्यक्ति जो बुंडिबुग्यो वायरस के मरीजों के संपर्क में आया है या जिसमें इसके लक्षण हैं, वह किसी भी परिस्थिति में अंतरराष्ट्रीय यात्रा नहीं कर सकता। केवल विशेष मेडिकल इवेकुएशन (चिकित्सीय निकासी) के मामलों में ही इसकी छूट होगी।
- 21 दिनों की निगरानी: डब्ल्यूएचओ ने संक्रमित देशों को सलाह दी है कि वे पुष्ट मामलों को तुरंत आइसोलेट करें। मरीजों के संपर्क में आए सभी लोगों (Contacts) की प्रतिदिन निगरानी की जाए। संक्रमण की संभावना वाले व्यक्ति को एक्सपोज़र के कम से कम 21 दिनों बाद तक राष्ट्रीय यात्राएं सीमित रखने और अंतरराष्ट्रीय यात्रा पर पूरी तरह रोक लगाने का नियम अनिवार्य किया गया है। इबोला का इनक्यूबेशन पीरियड (लक्षण दिखने का समय) 2 से 21 दिनों का होता है, इसलिए 21 दिन की यह अवधि बेहद महत्वपूर्ण है।
- बॉर्डर बंद न करने की अपील: एक तरफ जहां यात्रा पर पाबंदियां हैं, वहीं WHO ने देशों से आग्रह किया है कि वे पूरी तरह से अपनी सीमाएं बंद न करें और न ही व्यापार पर प्रतिबंध लगाएं। डब्ल्यूएचओ का मानना है कि अत्यधिक डर के कारण अगर आधिकारिक रास्ते बंद किए गए, तो लोग अनौपचारिक (Illegal/Informal) और बिना निगरानी वाले रास्तों से सीमाएं पार करेंगे, जिससे वायरस को ट्रैक करना असंभव हो जाएगा।
भारत सरकार का एक्शन प्लान: सुरक्षा के चार बड़े चक्र
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए चार प्रमुख स्तरों पर तैयारी शुरू की है। देश में किसी भी अप्रत्याशित स्थिति से निपटने के लिए निम्नलिखित बुनियादी ढांचे को सक्रिय किया गया है:
1. स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर्स (SOPs) की समीक्षा
स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए स्क्रीनिंग और सर्विलांस के SOPs को अपडेट करना शुरू कर दिया है। इसके तहत संदिग्ध मरीजों की पहचान कैसे की जाए, उन्हें किस तरह से एम्बुलेंस तक ले जाया जाए और डॉक्टरों को पीपीई किट के इस्तेमाल के क्या निर्देश होने चाहिए, इन सबका पुनर्मूल्यांकन किया जा रहा है।
2. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (NIV Pune) को कमान
इबोला वायरस की सटीक और त्वरित जांच के लिए पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (NIV Pune) को मुख्य टेस्टिंग सेंटर नामित किया गया है। इसके अलावा, आईसीएमआर (ICMR) देश के अन्य हिस्सों में भी चरणबद्ध तरीके से चुनिंदा वीआरडीएल (Viral Research and Diagnostic Laboratories) को इस वायरस की टेस्टिंग के लिए ऑनबोर्ड (तैयार) कर रहा है, ताकि जरूरत पड़ने पर देश के किसी भी हिस्से से सैंपल तुरंत जांचे जा सकें।
3. हवाई अड्डों और बंदरगाहों पर कड़ी स्क्रीनिंग
भारत के सभी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों (जैसे दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई) और समुद्री बंदरगाहों पर प्रभावित अफ्रीकी देशों से आने वाले यात्रियों की थर्मल स्क्रीनिंग और ट्रैवल हिस्ट्री की जांच तेज कर दी गई है। आव्रजन (Immigration) विभागों को निर्देश दिए गए हैं कि वे पिछले 21 दिनों में कांगो या युगांडा की यात्रा करने वाले यात्रियों का डेटा स्वास्थ्य अधिकारियों के साथ तुरंत साझा करें।
4. आइसोलेशन और क्वारंटाइन सुविधाओं का चिन्हांकन
प्रमुख हवाई अड्डों के नजदीकी बड़े सरकारी अस्पतालों में विशेष इबोला आइसोलेशन वार्ड्स को चिन्हित कर लिया गया है। इन वार्डों में वेंटिलेटर, फ्लूइड मैनेजमेंट सिस्टम और संक्रमण नियंत्रण के कड़े इंतजाम किए जा रहे हैं ताकि यदि कोई संदिग्ध यात्री मिलता है, तो उसे सीधे एयरपोर्ट से अस्पताल के आइसोलेशन में स्थानांतरित किया जा सके।
इबोला का इतिहास: अतीत के सबसे घातक आउटब्रेक्स पर एक नजर
इबोला वायरस कोई नया वायरस नहीं है। इसकी खोज पहली बार साल 1976 में हुई थी, जब कांगो (तत्कालीन जायरे) में इबोला नदी के पास स्थित एक गांव में इसका पहला मामला मिला था, इसी नदी के नाम पर इस वायरस का नाम 'इबोला' रखा गया। तब से लेकर अब तक इसके कई बड़े प्रकोप सामने आ चुके हैं:
| वर्ष | मुख्य प्रभावित क्षेत्र | वायरस स्ट्रेन | मामले (लगभग) | मौतें (लगभग) |
|---|---|---|---|---|
| 1976 | जायरे (कांगो) | जायरे स्ट्रेन | 318 | 280 (88%) |
| 2000-2001 | युगांडा | सूडान स्ट्रेन | 425 | 224 (53%) |
| 2007 | युगांडा (बुंडिबुग्यो) | बुंडिबुग्यो स्ट्रेन | 149 | 37 (25%) |
| 2014-2016 | पश्चिम अफ्रीका (गिनी, लाइबेरिया, सिएरा लियोन) | जायरे स्ट्रेन | 28,616 | 11,310 (40%) |
| 2018-2020 | पूर्वी कांगो (Kivu आउटब्रेक) | जायरे स्ट्रेन | 3,470 | 2,280 (66%) |
ऐतिहासिक आंकड़ों से स्पष्ट है कि 2014-2016 का पश्चिम अफ्रीकी आउटब्रेक इतिहास का सबसे भीषण इबोला आउटब्रेक था, जिसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया था। उस समय भी भारत सरकार ने दिल्ली और अन्य हवाई अड्डों पर बड़े पैमाने पर क्वारंटाइन सेंटर बनाए थे, जिसके कारण वायरस भारत में प्रवेश नहीं कर पाया था।
लक्षण और फैलाव: यह कैसे संक्रमित करता है?
अफ्रीका सेंटर्स फॉर डिजीज Control एंड प्रिवेंशन के अनुसार, इबोला वायरस हवा के जरिए (Airborne) नहीं फैलता है। इसका फैलाव केवल सीधे संपर्क के माध्यम से होता है।
संक्रमण के मुख्य माध्यम:
- संकरित व्यक्ति के शारीरिक तरल पदार्थ (जैसे खून, लार, पसीना, उल्टी, यूरीन या वीर्य) के सीधे संपर्क में आने से।
- संक्रमित तरल पदार्थों से दूषित हुई सामग्रियां, जैसे कपड़े, बिस्तर, सुई या अन्य चिकित्सा उपकरण।
- इस बीमारी से मृत हो चुके व्यक्तियों के शवों को सीधे छूने या पारंपरिक अंतिम संस्कार की रस्मों के कारण।
प्रमुख लक्षण:
संक्रमण के बाद मरीज में अचानक निम्नलिखित लक्षण दिखाई देने लगते हैं:
- तेज बुखार और अत्यधिक कमजोरी
- मांसपेशियों और जोड़ों में तेज दर्द
- सिरदर्द और गले में खराश
- संक्रमण बढ़ने पर उल्टी, डायरिया (दस्त) और त्वचा पर चकत्ते (Rashes) होना
- गंभीर मामलों में आंतरिक और बाहरी रक्तस्राव (Bleeding) होना, जिससे अंग विफलता (Organ Failure) हो जाती है।
अफवाहों से बचें: स्वास्थ्य मंत्रालय की जनता से अपील
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ आधिकारिक सूत्रों ने भारतीय नागरिकों और मीडिया घरानों से विशेष अपील की है कि वे इस स्थिति को लेकर किसी भी प्रकार का पैनिक (डर का माहौल) न पैदा करें और न ही सोशल मीडिया पर किसी भी प्रकार की असत्यापित जानकारी या भ्रामक खबरों को साझा करें।
सरकार ने स्पष्ट तौर पर आश्वस्त किया है कि भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचा (Public Health Infrastructure) किसी भी प्रकार की वैश्विक महामारी या आपातकाल से निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार, सतर्क और सक्षम है। नागरिकों को सलाह दी गई है कि वे केवल स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा समय-समय पर जारी की जाने वाली आधिकारिक सूचनाओं और स्वास्थ्य बुलेटिन पर ही विश्वास करें।