हाल ही में अटलांटिक महासागर में घूम रहे एक डच क्रूज शिप, MV Hondius, पर हंता वायरस के फैलने से पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, अब तक 11 मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें से 3 लोगों की मौत हो गई है। भारत में भी सरकार अलर्ट पर है और ICMR ने अपने 165 लैब के नेटवर्क को सक्रिय कर दिया है ताकि देश में इस वायरस के प्रवेश को रोका जा सके।
क्रूज शिप का 'वेंटिलेशन सिस्टम' और वायरस का अदृश्य प्रसारज़्यादातर न्यूज़ पोर्टल केवल 'चूहों' की बात कर रहे हैं, लेकिन कोई भी बंद जगहों (Enclosed Spaces) में इसके फैलने के तकनीकी कारणों पर चर्चा नहीं कर रहा है।
मुख्य पॉइंट्स
• हंता वायरस मुख्य रूप से संक्रमित चूहों के मल-मूत्र की सूखी धूल (Aerosolization) के जरिए फैलता है।
• क्रूज शिप जैसे बंद वातावरण में, सेंट्रलाइज्ड एयर कंडीशनिंग इस वायरस के महीन कणों को एक केबिन से दूसरे केबिन तक पहुँचा सकती है।
• अंडेस वायरस (Andes Virus), जो इस बार मिला है, दुनिया का इकलौता हंता वायरस वेरिएंट है जो 'इंसान से इंसान' में फैल सकता है।
क्वारंटीन का 42 दिन का गणित और व्यक्तिगत जोखिम का आकलन
एक्सपोज़र का समय: अगर आप संक्रमित क्षेत्र में 15 मिनट से कम रहे हैं, तो जोखिम कम है, लेकिन बंद कमरे में लंबे समय तक रहने पर संक्रमण की संभावना 40% तक बढ़ जाती है।
इम्युनिटी फैक्टर: यह वायरस शरीर के इम्यून सिस्टम को ही उसके खिलाफ कर देता है (Cytokine Storm), जिससे फेफड़ों में पानी भर जाता है (HPS)।
क्वारंटीन की अवधि: WHO ने 42 दिन का क्वारंटीन सुझाया है क्योंकि इस वायरस का इंक्यूबेशन पीरियड (लक्षण दिखने का समय) 1 से 8 हफ्ते तक हो सकता है
ICMR का 'वायरल शील्ड' और ग्राउंड ज़ीरो की तैयारी
भारत ने अपने 165 'वायरल रिसर्च एंड डायग्नोस्टिक लेबोरेटरीज' (VRDL) को अलर्ट किया है। एयरपोर्ट्स पर थर्मल स्क्रीनिंग के बजाय अब 'ट्रैवल हिस्ट्री' पर जोर दिया जा रहा है, खासकर उन यात्रियों पर जो अर्जेंटीना या चिली से आए हैं। दो भारतीय क्रूज मेंबर्स को पहले ही निगरानी में रखा गया है और नीदरलैंड्स में उनका इलाज चल रहा है।
हंता वायरस के बारे में 5 बड़े भ्रम और उनकी सच्चाई
यह कोरोना की तरह हवा में उड़कर मीलों तक फैलता है। सच्चाई: यह केवल बहुत करीबी संपर्क या संक्रमित धूल के सीधे संपर्क से फैलता है। पालतू चूहों (Hamsters) से भी यह फैल सकता है। सच्चाई यह केवल कुछ विशिष्ट जंगली चूहों (जैसे Deer Mouse) से फैलता है। एंटीबायोटिक्स इसे ठीक कर सकते हैं। सच्चाहै ।यह एक वायरस है, इस पर एंटीबायोटिक्स काम नहीं करते। केवल सपोर्टिव केयर (जैसे वेंटिलेटर या आर्टिफिशियल लंग) ही जान बचा सकती है।
क्लाइमेट चेंज और नए वायरस का उदय हम कहाँ चूक रहे हैं ?
इको-टूरिज्म का खतरा लोग अब अंटार्कटिका और दुर्गम द्वीपों पर जा रहे हैं जहाँ के जीव-जंतुओं के संपर्क में आने से नए वायरस इंसानों में आ रहे हैं। जीनोम सीक्वेंसिंग अंडेस वायरस के म्यूटेशन को समझना क्यों जरूरी है ताकि यह 'सुपर-स्प्रेडर' न बन जाए। वन हेल्थ अप्रोच (One Health Approach) जानवरों और इंसानों के स्वास्थ्य को एक साथ जोड़कर देखना ही अगली महामारी का समाधान है।
वायरस का मौजूदा आउटब्रेक अभी "लो ग्लोबल रिस्क" पर है, लेकिन इसकी मृत्यु दर (30-50%) इसे बेहद खतरनाक बनाती है। सतर्कता और सही जानकारी ही इससे बचाव का एकमात्र रास्ता है।