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महंगाई की नई मार: दिल्ली-एनसीआर समेत कई शहरों में PNG के दाम बढ़े, जानें आपकी जेब पर कितना असर पड़ेगा

प्राकृतिक गैस की कीमतों में यह उछाल मुख्य रूप से वैश्विक अस्थिरता और सप्लाई चेन में आए व्यवधान का परिणाम है। हालांकि PNG अभी भी बिजली के चूल्हों या कुछ अन्य ईंधनों की तुलना में सुविधाजनक है, लेकिन लगातार बढ़ती कीमतें मध्यमवर्गीय परिवारों की डिस्पोजेबल इनकम को कम कर रही हैं। अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें स्थिर नहीं होतीं, तो आने वाले समय में अन्य लॉजिस्टिक खर्चों में भी बढ़ोतरी देखी जा सकती है।
महंगाई की नई मार: दिल्ली-एनसीआर समेत कई शहरों में PNG के दाम बढ़े, जानें आपकी जेब पर कितना असर पड़ेगा

भारतीय अर्थव्यवस्था में पिछले कुछ वर्षों से महंगाई एक ऐसी चुनौती बनी हुई है, जिसका सीधा असर आम आदमी की थाली पर पड़ता है। हाल ही में इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड (IGL) द्वारा घरेलू पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) की कीमतों में की गई बढ़ोतरी ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है। 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी हुई ये नई दरें केवल दिल्ली-एनसीआर ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कई प्रमुख शहरों के लाखों परिवारों के मासिक बजट को बिगाड़ने वाली हैं। ऐसे समय में जब पहले से ही खाद्यान्न और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं, पाइप वाली गैस का महंगा होना मध्यमवर्ग के लिए एक बड़ा झटका है।

कहाँ कितनी बढ़ी दरें?

किन शहरों में कितनी बढ़ी कीमत?

PNG की कीमतों में वृद्धि अलग-अलग राज्यों और शहरों के आधार पर की गई है। मुख्य शहरों की नई दरें इस प्रकार हैं:

दिल्ली: देश की राजधानी में रहने वाले लोगों को अब प्रति मानक घन मीटर (SCM) पर 1.70 रुपये अतिरिक्त देने होंगे। यहाँ पुरानी दर 47.89 रुपये थी, जो अब बढ़कर 49.59 रुपये प्रति SCM हो गई है।

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नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद: उत्तर प्रदेश के इन प्रमुख इलाकों में कीमतें 47.76 रुपये से बढ़ाकर 49.46 रुपये प्रति SCM कर दी गई हैं।

कानपुर और आसपास के क्षेत्र: कानपुर, फतेहपुर, हमीरपुर और चित्रकूट में अब उपभोक्ताओं को 48.95 रुपये प्रति SCM का भुगतान करना होगा। यहाँ पहले कीमत 47.95 रुपये थी।

मेरठ और शामली: मेरठ, मुजफ्फरनगर और शामली में दाम 47.35 रुपये से बढ़कर 48.35 रुपये प्रति SCM हो गए हैं।

राजस्थान: अजमेर, पाली और राजसमंद में भी गैस की नई दर 48.27 रुपये प्रति SCM तय की गई है।

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गैस वितरण कंपनियों ने इस बार कीमतों में एकमुश्त वृद्धि की है, जो अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में अलग-अलग है। दिल्ली जैसे महानगर में, जहाँ लाखों घर पूरी तरह से PNG पर निर्भर हैं, वहां प्रति मानक घन मीटर (SCM) पर 1.70 रुपये का इजाफा हुआ है। दिल्ली में अब नई दर 49.59 रुपये प्रति SCM हो गई है।

उत्तर प्रदेश के औद्योगिक और आवासीय हब जैसे नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद में कीमतें 47.76 रुपये से बढ़कर 49.46 रुपये प्रति SCM पर पहुँच गई हैं। इसी तरह, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, मुजफ्फरनगर और शामली में भी उपभोक्ताओं को अब 48.35 रुपये प्रति SCM की दर से भुगतान करना होगा। उत्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों जैसे कानपुर, फतेहपुर और हमीरपुर में भी एक रुपये प्रति यूनिट की बढ़ोतरी देखी गई है। राजस्थान के अजमेर और पाली जैसे शहरों में भी दरें बढ़ाकर 48.27 रुपये कर दी गई हैं। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि महंगाई की यह लहर देश के एक बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले चुकी है।

राजनीति और घरेलू बाजार का अंतर्संबंध

अक्सर यह सवाल उठता है कि भारत में गैस की कीमतें अचानक क्यों बढ़ जाती हैं? इसका जवाब भारत की आयात पर निर्भरता और वैश्विक भू-राजनीतिक स्थितियों में छिपा है। आईजीएल और अन्य वितरण कंपनियों का स्पष्ट तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में जो अस्थिरता है, उसका सीधा असर घरेलू कीमतों पर पड़ता है।

वर्तमान में पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला कर रख दिया है। स्वेज नहर और लाल सागर के रास्तों से होने वाली सप्लाई चेन में बाधा आने के कारण गैस के परिवहन (Freight) की लागत कई गुना बढ़ गई है। भारत अपनी जरूरत की प्राकृतिक गैस का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क कीमतों में वृद्धि होती है, तो घरेलू कंपनियों के पास उपभोक्ताओं पर बोझ डालने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। इसके अतिरिक्त, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर में होने वाले उतार-चढ़ाव भी आयातित गैस को महंगा बना देते हैं।

एलपीजी (LPG) बनाम पीएनजी (PNG): विकल्प अब महंगे

एक समय था जब सरकार और कंपनियां लोगों को एलपीजी सिलेंडर छोड़कर पीएनजी अपनाने के लिए प्रेरित करती थीं। पीएनजी को न केवल सुरक्षित और सुविधाजनक बताया जाता था, बल्कि यह एलपीजी के मुकाबले 15 से 20 प्रतिशत सस्ती भी हुआ करती थी। हालांकि, पिछले दो वर्षों में जिस गति से पीएनजी के दाम बढ़े हैं, उसने इस बचत के अंतर को काफी कम कर दिया है।

मार्च 2026 में ही घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में 60 रुपये की वृद्धि हुई थी। वहीं, कमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमतें पिछले तीन महीनों में कुल 338 रुपये तक बढ़ चुकी हैं। अब पीएनजी का महंगा होना यह दर्शाता है कि स्वच्छ ईंधन के रूप में गैस का उपयोग अब एक महंगा सौदा होता जा रहा है। उपभोक्ताओं के लिए चिंता की बात यह है कि सिलेंडर खत्म होने पर उनके पास वैकल्पिक व्यवस्था होती है, लेकिन पीएनजी के मामले में वे पूरी तरह से कंपनी की तय दरों और निरंतर आपूर्ति पर निर्भर होते हैं।

घरेलू बजट पर व्यापक असर

एक औसत भारतीय परिवार, जिसमें 4 से 5 सदस्य होते हैं, वहां महीने में लगभग 25 से 30 SCM गैस की खपत होती है। दिल्ली के संदर्भ में देखें तो 1.70 रुपये प्रति SCM की बढ़ोतरी का मतलब है कि हर महीने गैस बिल में सीधा 50 से 70 रुपये का इजाफा। सुनने में यह राशि छोटी लग सकती है, लेकिन जब इसे बिजली बिल, पानी के बिल, बढ़ते पेट्रोल-डीजल के दाम और महंगी सब्जियों के साथ जोड़कर देखा जाता है, तो यह बचत में बड़ी सेंध लगाती है।

महंगाई का यह असर केवल घर की रसोई तक सीमित नहीं रहता। कमर्शियल गैस महंगी होने से होटल, रेस्टोरेंट और ढाबों पर खाने की कीमतें बढ़ती हैं। जब बाहर का खाना महंगा होता है और घर के अंदर भी लागत बढ़ती है, तो मध्यम आय वर्ग की 'डिस्पोजेबल इनकम' (खर्च करने योग्य आय) कम हो जाती है। इसका सीधा असर बाजार की मांग और देश की आर्थिक गति पर भी पड़ता है।

वितरण कंपनियों की चुनौतियां

गैस वितरण कंपनियों के पक्ष को देखें तो उनके सामने भी कई चुनौतियां हैं। सरकार की 'गैस आधारित अर्थव्यवस्था' (Gas-based Economy) बनाने की योजना के तहत बुनियादी ढांचे का विस्तार किया जा रहा है। पाइपलाइन बिछाने, सुरक्षा मानकों को बनाए रखने और डिजिटल मीटरिंग सिस्टम को अपडेट करने में भारी निवेश की आवश्यकता होती है। जब इनपुट कॉस्ट (कच्चे माल की लागत) बढ़ती है, तो कंपनियों को अपने परिचालन लाभ (Operating Profit) को बनाए रखने के लिए कीमतों में संशोधन करना पड़ता है। हालांकि, जानकारों का कहना है कि कंपनियों को अपनी दक्षता बढ़ाकर कुछ बोझ खुद भी उठाना चाहिए ताकि आम जनता को राहत मिल सके।

भविष्य की राह और सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता

गैस की बढ़ती कीमतों के इस दौर में अब समय आ गया है कि सरकार टैक्स ढांचे पर पुनर्विचार करे। वर्तमान में प्राकृतिक गैस को जीएसटी (GST) के दायरे से बाहर रखा गया है, जिसके कारण अलग-अलग राज्यों में वैट (VAT) की दरें अलग-अलग होती हैं। यदि प्राकृतिक गैस को जीएसटी के दायरे में लाया जाता है, तो टैक्स का बोझ कम हो सकता है और पूरे देश में एक समान और अपेक्षाकृत सस्ती कीमतें मिल सकती हैं।

इसके अलावा, घरेलू स्तर पर प्राकृतिक गैस के उत्पादन को बढ़ाने के लिए निवेश को प्रोत्साहित करना अनिवार्य है। जब तक भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए वैश्विक बाजार और भू-राजनीतिक स्थितियों पर निर्भर रहेगा, तब तक आम आदमी की रसोई पर महंगाई की तलवार लटकती रहेगी।

PNG की बढ़ती कीमतों ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले समय में ऊर्जा की लागत और बढ़ सकती है। आम आदमी जो पहले से ही बढ़ती खाद्य वस्तुओं की कीमतों से परेशान है, अब उसे अपने मासिक बजट में ईंधन के लिए और अधिक प्रावधान करना होगा।

 

Disclaimer
 इस लेख में दी गई जानकारी उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट्स और आधिकारिक घोषणाओं पर आधारित है। गैस की कीमतें समय-समय पर सरकारी नीतियों और वैश्विक बाजार के अनुसार बदलती रहती हैं। सटीक दरों और बिलिंग संबंधी जानकारी के लिए कृपया अपने संबंधित गैस वितरण प्रदाता (जैसे IGL, Adani Gas, आदि) की आधिकारिक वेबसाइट चेक करें।

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