वाशिंगटन/तेहरान: मध्य पूर्व (Middle East) में जारी रणनीतिक संघर्ष को समाप्त करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनयिक प्रयास तेज हो गए हैं, लेकिन दोनों महाशक्तियों के बीच बुनियादी और नीतिगत मतभेद अभी भी जस के तस बने हुए हैं। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार की वाशिंगटन में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ होने वाली बैठक के बीच, शांति समझौते के मसौदे को लेकर कई ऐसे जटिल तकनीकी और विनियामक मुद्दे सामने आए हैं, जिन्होंने इस कूटनीतिक समाधान की राह को अत्यधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जहां एक ओर मार्च के मध्य से युद्ध समाप्ति के दावे कर रहे हैं, वहीं दोनों पक्षों के आधिकारिक रुख का विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है कि जमीनी हकीकत दावों से कोसों दूर है।
ईरानी सूत्रों के अनुसार, वार्ता के प्रारंभिक चरणों में ईरान द्वारा यूरेनियम को 5 प्रतिशत की शुद्धता तक संवर्धित करने और फिर उसे वापस प्राप्त करने से जुड़े तकनीकी पहलुओं पर विचार किया गया है। परंतु, इस समझौते को अंतिम रूप देने से पूर्व अभी भी कई विनियामक और सामरिक प्रश्नों का उत्तर खोजना शेष है। इनमें सबसे प्रमुख यह है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम कितने समय के लिए स्थगित रहेगा, क्या उसकी परमाणु साइटों को पूरी तरह से नष्ट (Dismantle) किया जाएगा, और वर्तमान में ईरान के पास मौजूद 20 प्रतिशत और 5 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम के विशाल भंडार (Stockpiles) का भविष्य क्या होगा। इसके अतिरिक्त, ईरान के उन्नत सेंट्रीफ्यूज (Advanced Centrifuges), उसके अनुसंधान एवं विकास (R&D) कार्यक्रमों के भविष्य और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों की पहुंच को नियंत्रित करने वाले नियमों (Inspections Regime) पर भी दोनों पक्षों में गहरा गतिरोध है।
बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता इजरायल की सुरक्षा और ईरान का संप्रभु रुख
परमाणु कार्यक्रम के अलावा, इस संभावित समझौते के मार्ग में 'बैलिस्टिक मिसाइल' (Ballistic Missiles) का मुद्दा एक बड़ा सैन्य गतिरोध बना हुआ है। युद्ध की शुरुआत से पहले ही अमेरिका की यह प्रमुख और गैर-परक्राम्य (Non-negotiable) मांग रही है कि ईरान अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों की मारक क्षमता (Range) को एक निश्चित सीमा के भीतर सीमित करे, ताकि वे सीधे तौर पर अमेरिकी सहयोगी देश इजरायल तक पहुंचने में सक्षम न हो सकें।
इसके विपरीत, तेहरान ने इस रणनीतिक मांग को शुरू से ही खारिज किया है। ईरानी रक्षा मंत्रालय का आधिकारिक रुख है कि पारंपरिक हथियारों को विकसित करने और अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता की रक्षा करने का उसका अधिकार पूरी तरह से गैर-परक्राम्य है। ईरान के पास वर्तमान में मध्य पूर्व का सबसे बड़ा और आधुनिक मिसाइल गंतव्य (Arsenal) मौजूद है, जिसे वह किसी भी कूटनीतिक दबाव में कम करने के लिए तैयार नहीं है। इस प्रकार, मिसाइल रेंज का यह विनियामक पेंच इजरायल और अमेरिका की सुरक्षा चिंताओं तथा ईरान की राष्ट्रीय संप्रभुता के बीच एक सीधा टकराव पैदा करता है।
आर्थिक प्रतिबंध और फ्रीज संपत्तियां तेहरान की मांग और अमेरिकी घरेलू राजनीति
ईरान का यह कूटनीतिक रुख उसके आंतरिक आर्थिक हालातों से भी प्रभावित है। वर्षों से लगे कड़े अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रतिबंधों के कारण ईरानी अर्थव्यवस्था को भारी क्षति पहुंची है। इस आर्थिक मंदी और मुद्रास्फीति के परिणामस्वरूप इसी वर्ष जनवरी में ईरान के भीतर राष्ट्रव्यापी जन-असंतोष और विरोध प्रदर्शन (Nationwide Unrest) भी देखे गए थे। यही कारण है कि तेहरान के लिए इस समय सबसे बड़ी प्राथमिकता इन प्रतिबंधों को हटवाना और विदेशी बैंकों में फ्रीज (जब्त) पड़े अपने दसियों अरब डॉलर के तेल राजस्व (Oil Revenues) को मुक्त कराना है। इसके अतिरिक्त, ईरान ने युद्ध के कारण हुए बुनियादी ढांचे के नुकसान के लिए अमेरिका से भारी युद्ध क्षतिपूर्ति (Reparations) की भी मांग की है।
हालांकि, अमेरिकी प्रशासन इस मोर्चे पर कड़ा रुख अपनाए हुए है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अतीत में पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की इस बात के लिए तीखी आलोचना (Lambaste) कर चुके हैं कि उन्होंने 2015 के ऐतिहासिक परमाणु समझौते (JCPOA) के तहत ईरान की कुछ फ्रीज संपत्तियों को वापस कर दिया था। ट्रंप प्रशासन की घरेलू राजनीतिक मजबूरियां उन्हें ईरान को सीधी नकदी या राहत देने से रोकती हैं। हालांकि, हालिया अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स से यह संकेत मिले हैं कि इस गतिरोध को तोड़ने के लिए एक बीच का रास्ता निकाला जा रहा है, जिसके तहत सीधे तौर पर नकद राशि लौटाने के बजाय ईरान के लिए एक विशेष 'अंतरराष्ट्रीय निवेश कार्यक्रम' (Investment Programme) को समझौते के नए ड्राफ्ट में शामिल किया जा सकता है।
लेबनान युद्धविराम का उल्लंघन क्षेत्रीय कड़ियों का जटिल जाल
ईरान-अमेरिका वार्ता की सफलता पूरी तरह से लेबनान के मोर्चे पर होने वाले घटनाक्रमों से जुड़ी हुई है। तेहरान ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि लेबनान में उसके मुख्य क्षेत्रीय सहयोगी हिजबुल्लाह के खिलाफ इजरायल के सैन्य अभियानों को पूरी तरह रोकना किसी भी शांति समझौते की अनिवार्य शर्त होगी। हालांकि, पिछले महीने इजरायल और लेबनान के बीच आधिकारिक तौर पर युद्धविराम (Ceasefire) की सहमति बनी थी, लेकिन धरातल पर यह समझौता पूरी तरह विफल होता दिखाई दे रहा है।
वर्तमान स्थिति यह है कि इजरायल और हिजबुल्लाह दोनों ही एक-दूसरे पर युद्धविराम के निरंतर और गंभीर उल्लंघनों का आरोप लगा रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप, इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान में अपने सैन्य अभियान की आक्रामकता को और अधिक बढ़ा दिया है। इस सीमावर्ती टकराव की गंभीरता तब और बढ़ गई जब लेबनानी सेना ने आधिकारिक पुष्टि की कि एक हालिया इजरायली हमले में उनका एक नियमित सैनिक मारा गया है। इजरायल किसी भी ऐसे अमेरिकी-ईरानी समझौते का पुरजोर विरोध कर रहा है, जो लेबनान के भीतर हिजबुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई करने की उसकी सैन्य स्वतंत्रता को सीमित करता हो।
यूएस-ईरान शांति वार्ता: विवाद के मुख्य रणनीतिक बिंदु और दोनों पक्षों के आधिकारिक रुख
इस बहुपक्षीय भू-राजनीतिक संकट, परमाणु विनियामकों और सैन्य रणनीतियों को स्पष्ट रूप से समझने के लिए नीचे दी गई तालिका में प्रमुख विवादित क्षेत्रों का विश्लेषणात्मक विवरण प्रस्तुत किया गया है:
| विवाद का मुख्य क्षेत्र | संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) का रुख एवं मांगें | ईरान (Iran) का आधिकारिक रुख एवं शर्तें | वैश्विक आर्थिक एवं सामरिक प्रभाव |
|---|---|---|---|
| यूरेनियम संवर्धन (Nuclear Program) | परमाणु साइटों को पूरी तरह नष्ट किया जाए; 5% और 20% के स्टॉकपाइल पर कड़ा नियंत्रण और सख्त निरीक्षण लागू हो। | 5% शुद्धता तक संवर्धन का सीमित अधिकार मिले; परमाणु कार्यक्रम को केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए जारी रखने की वकालत। | यदि निरीक्षण नियमों पर सहमति नहीं बनती, तो मध्य पूर्व में परमाणु हथियारों की होड़ बढ़ने का खतरा। |
| बैलिस्टिक मिसाइल (Missile Range) | मिसाइलों की मारक क्षमता को सीमित किया जाए ताकि वे इजरायल की सीमाओं तक न पहुंच सकें। | पारंपरिक हथियारों और मिसाइल रक्षा प्रणाली पर कोई समझौता नहीं; इसे संप्रभु अधिकार बताया। | इजरायल की सुरक्षा चिंताओं के कारण अमेरिका इस मोर्चे पर अपनी शर्तों को ढीला नहीं कर सकता। |
| प्रतिबंध और संपत्तियां (Sanctions & Assets) | सीधे तौर पर फ्रीज संपत्तियां लौटाने का विरोध (ओबामा नीति की आलोचना); केवल निवेश कार्यक्रम का विकल्प संभव। | सभी आर्थिक प्रतिबंध तुरंत हटाए जाएं; तेल राजस्व के दसियों अरब डॉलर मुक्त हों और युद्ध क्षतिपूर्ति मिले। | ईरानी तेल के वैश्विक बाजार में वैध रूप से आने से कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों पर गहरा असर पड़ सकता है। |
| लेबनान एवं हिजबुल्लाह संकट | लेबनान में हिजबुल्लाह को पीछे धकेलने के लिए इजरायल की सैन्य कार्रवाई की स्वतंत्रता का समर्थन। | समझौते के लिए लेबनान में इजरायली हमलों का पूर्ण रूप से बंद होना अनिवार्य शर्त। | युद्धविराम के लगातार उल्लंघन से लेबनान में पुनः पूर्णकालिक युद्ध भड़कने और तेल आपूर्ति मार्ग प्रभावित होने की आशंका। |
इस विस्तृत रणनीतिक परिदृश्य से स्पष्ट है कि वाशिंगटन और तेहरान के बीच चल रही कूटनीतिक खींचतान केवल दो देशों के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण मध्य पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था, वैश्विक तेल अर्थव्यवस्था और परमाणु अप्रसार (Nuclear Non-proliferation) की नीतियों को नियंत्रित करने वाली एक बेहद संवेदनशील बिसात है। यूरेनियम संवर्धन के तकनीकी मानकों से लेकर लेबनान की सीमाओं पर चल रही गोलाबारी तक, हर एक बिंदु आपस में जुड़ा हुआ है। आने वाले दिनों में वाशिंगटन कूटनीतिक वार्ता के माध्यम से इन विनियामक पेंचों को सुलझा पाता है या क्षेत्र एक बार फिर गहरे सैन्य संकट की ओर बढ़ता है, यह देखना अंतरराष्ट्रीय नीति-निर्माताओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।