अगर आप उन लोगों में से हैं जिन्हें अक्सर माइग्रेन यानी आधे सिर के दर्द की शिकायत रहती है तो आपके लिए एक बहुत बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आई है। एक ताज़ा रिसर्च में यह दावा किया गया है कि हवा में बढ़ता प्रदूषण और मौसम में होने वाले बदलाव आपके माइग्रेन के हमलों को न सिर्फ तेज कर रहे हैं बल्कि उन्हें बार-बार ट्रिगर भी कर रहे हैं। इजरायल की बेन-गुरियन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक लंबी स्टडी के बाद यह खुलासा किया है कि खराब हवा और बढ़ती गर्मी माइग्रेन के मरीजों के लिए किसी दुश्मन से कम नहीं है। अब तक हम मानते थे कि माइग्रेन सिर्फ ज्यादा रोशनी या शोर-शराबे से होता है लेकिन अब यह साफ हो गया है कि धूल के कण और गाड़ियों का धुआं आपके दिमाग की नसों में हलचल पैदा कर रहे हैं। देश टीवी 24 की इस खास रिपोर्ट में जानिए कि कैसे पर्यावरण आपके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहा है और आप इससे कैसे बच सकते हैं।
प्रदूषण के कण और बढ़ती गर्मी कैसे बनते हैं माइग्रेन के सबसे बड़े दुश्मन
रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि जब भी हवा में धूल के छोटे कण यानी PM10 और PM2.5 का स्तर बढ़ता है तो माइग्रेन के मरीजों की संख्या अस्पतालों में अचानक बढ़ जाती है। इजरायल के नेगेव रेगिस्तान के पास रहने वाले करीब 7000 लोगों पर 10 साल तक स्टडी की गई जिससे यह पता चला कि हवा में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसी गैसें माइग्रेन की दवाओं के इस्तेमाल को 10 प्रतिशत तक बढ़ा देती हैं। असल में यह प्रदूषण हमारे शरीर के अंदर जाकर सूजन पैदा करता है और नसों को प्रभावित करता है जिससे सिरदर्द की शुरुआत होती है। रिसर्च के लेखक इडो पेलेस का कहना है कि गर्मी और उमस जैसे कारक जोखिम को बढ़ाते हैं जबकि प्रदूषण के बढ़ते स्तर सीधे तौर पर अटैक को ट्रिगर कर देते हैं। इसका मतलब है कि अगर बाहर हवा खराब है तो आपको सिरदर्द होने के चांस कई गुना बढ़ जाते हैं।
मौसम और प्रदूषण का जानलेवा मेल जो बढ़ा रहा है आपकी तकलीफ
हैरानी की बात यह है कि सिर्फ प्रदूषण ही नहीं बल्कि मौसम भी इसमें बड़ी भूमिका निभाता है। स्टडी में यह देखा गया कि जब तापमान ज्यादा होता है और हवा में नमी कम होती है तो नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसी जहरीली गैसों का असर और भी घातक हो जाता है। वहीं दूसरी ओर ठंड और ज्यादा उमस वाले मौसम में धूल के कण यानी PM2.5 माइग्रेन के दर्द को और ज्यादा बढ़ा देते हैं। प्रदूषण का असर शरीर पर तुरंत नहीं बल्कि कभी-कभी दो से सात दिनों के बाद भी दिखाई देता है। वैज्ञानिकों ने गौर किया कि जिस दिन अस्पतालों में माइग्रेन के सबसे ज्यादा मरीज पहुंचे उस दिन हवा में प्रदूषण का स्तर औसत से काफी ऊपर था। यह आंकड़े साफ बताते हैं कि बदलता जलवायु चक्र हमारे दिमाग की सेहत के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
डॉक्टर और एक्सपर्ट्स की क्या है सलाह और कैसे करें अपना बचाव
आने वाले समय में जब जलवायु परिवर्तन की वजह से लू और धूल भरी आंधियां बढ़ेंगी तो माइग्रेन के मरीजों की समस्या और भी विकराल हो सकती है। पेलेस का सुझाव है कि डॉक्टरों को अब मरीजों को दवा देने के साथ-साथ मौसम और प्रदूषण के पूर्वानुमान को देखने की सलाह भी देनी चाहिए। अगर आपको पता है कि आने वाले दिनों में प्रदूषण का स्तर बढ़ने वाला है तो आपको बाहर जाने से बचना चाहिए और घर के अंदर एयर फिल्टर का इस्तेमाल करना चाहिए। इसके अलावा माइग्रेन के पहले संकेत मिलते ही सावधानी बरतना और दवा लेना अटैक को गंभीर होने से रोक सकता है। बाहरी कारकों को नियंत्रण में रखना हमारे हाथ में नहीं है लेकिन अपनी आदतों और सावधानियों से हम इस दर्दनाक अनुभव को कम जरूर कर सकते हैं।
विशेष राय
माइग्रेन का दर्द वही समझ सकता है जिसे यह होता है और अब इसमें प्रदूषण का जुड़ जाना एक बड़ी चेतावनी है। हम अपनी सेहत को लेकर अक्सर लापरवाह रहते हैं लेकिन अब समय आ गया है कि हम अपने आसपास की हवा को लेकर भी गंभीर हों। अगर आप शहर के भीड़भाड़ वाले इलाके में रहते हैं जहाँ ट्रैफिक ज्यादा है तो मास्क का इस्तेमाल और प्रदूषण के स्तर पर नज़र रखना आपके लिए अनिवार्य हो जाना चाहिए। देश टीवी 24 का मानना है कि सेहत सिर्फ खान-पान तक सीमित नहीं है बल्कि हम कैसी हवा में सांस ले रहे हैं यह भी उतना ही जरूरी है। खुद को सुरक्षित रखें और मौसम के मिजाज को समझकर ही अपनी दिनचर्या तय करें।