नई दिल्ली : भारत में लोकतंत्र के महापर्व की आहुति डलते ही आम आदमी की रसोई और जेब पर महंगाई की गाज गिरनी शुरू हो गई है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों और पश्चिम बंगाल के अंतिम चरण के मतदान के संपन्न होते ही पेट्रोलियम कंपनियों ने अपने 'फ्रोजन' मोड को हटा दिया है। इसकी पहली आहट 1 मई को तब सुनाई दी, जब कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में एक झटके में करीब 1000 रुपये की ऐतिहासिक बढ़ोतरी कर दी गई। अब गलियारों में चर्चा इस बात की है कि क्या अगले 48 से 72 घंटों में पेट्रोल और डीजल की कीमतें भी आम आदमी के पसीने छुड़ाने वाली हैं?
कमर्शियल सिलेंडर का झटका छोटे कारोबारियों की कमर टूटी
मजदूर दिवस यानी 1 मई की सुबह जब देश उत्सव मना रहा था, तब तेल कंपनियों ने कमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमतों में 994 रुपये की भारी वृद्धि कर दी। राजधानी दिल्ली में जो सिलेंडर पहले ₹2078 के आसपास था, वह अब ₹3071.50 के पार पहुंच गया है।
यह केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि देश के लाखों ढाबा संचालकों, होटल मालिकों और कैटरिंग व्यवसाय से जुड़े लोगों के लिए एक 'डेथ वारंट' जैसा है। जब ईंधन की लागत में 81% का इजाफा (फरवरी से अब तक) देखा जाता है, तो उसका सीधा असर आम आदमी की थाली पर पड़ता है। चाय की चुस्की से लेकर दोपहर के भोजन की थाली तक, अब हर चीज के दाम बढ़ने तय हैं।
पेट्रोल-डीजल पर टिकी निगाहें सूत्रों का दावा ₹5 तक की वृद्धि संभव
सरकारी और पेट्रोलियम मंत्रालय के उच्च सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, पेट्रोल और डीजल की कीमतों में ₹4 से ₹5 प्रति लीटर की बढ़ोतरी पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। 2022 के बाद से भारत में ईंधन की कीमतें काफी हद तक स्थिर रही थीं, लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही है।
कीमतें बढ़ने के तीन प्रमुख आधार
पश्चिम एशिया का युद्ध संकट ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखला को बाधित कर दिया है। हॉर्मोज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) जहां से दुनिया का 20% कच्चा तेल गुजरता है, वहां युद्ध के बादलों ने कच्चे तेल (Brent Crude) को 115-120 डॉलर प्रति बैरल के खतरनाक स्तर पर पहुंचा दिया है।
तेल कंपनियों का घाटा (Under-recoveries) कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज जैसी वित्तीय संस्थाओं की मानें तो सरकारी तेल कंपनियों (IOCL, BPCL, HPCL) को लागत और बिक्री के बीच भारी अंतर का सामना करना पड़ रहा है। इस घाटे की भरपाई के लिए तकनीकी रूप से ₹20 से ₹25 की वृद्धि की आवश्यकता है, लेकिन सरकार इसे किस्तों में लागू कर सकती है।
राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) गिरता रुपया (जो ₹95 के पार चला गया है) और बढ़ता व्यापार घाटा सरकार पर दबाव बना रहा है कि वह सब्सिडी का बोझ कम करे।
विपक्ष का प्रहार
इस मुद्दे पर सियासत भी अपने चरम पर है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए इसे "चुनावी बिल" करार दिया है। उनका आरोप है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता था, तब सरकार ने भारी टैक्स वसूल कर अपना खजाना भरा, और अब जब वैश्विक संकट है, तो उसका पूरा बोझ जनता की जेब पर डाल दिया गया है।
वहीं, समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने भी सरकार को घेरते हुए कहा कि यह भाजपा का पुराना 'ब्लूप्रिंट' है चुनाव तक राहत, चुनाव बाद आफत। विपक्षी नेताओं का दावा है कि 2017 और 2022 के चुनावों के बाद भी ठीक इसी तरह का पैटर्न देखा गया था, जहां मतदान खत्म होते ही कीमतों में 'दैनिक संशोधन' का दौर शुरू हो गया था।
विशेषज्ञों की राय क्या भुखमरी की ओर बढ़ रहे हैं हम ?
विश्व बैंक (World Bank) की हालिया रिपोर्ट भारत के संदर्भ में चिंताजनक संकेत दे रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऊर्जा की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं, तो भारत का एक बड़ा मध्यम वर्ग 'गरीबी रेखा' के नीचे फिसल सकता है। राजीव रंजन सिंह जैसे आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि भारत अपनी जरूरत का 80% से अधिक कच्चा तेल और 50% से अधिक एलपीजी आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता का सीधा असर हमारी घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ना अनिवार्य है।
मध्यम वर्ग के लिए आगे की राह
सरकार वर्तमान में 'लाडली बहना' या 'मुफ्त राशन' जैसी योजनाओं के जरिए निचले तबके को राहत देने की कोशिश कर रही है, लेकिन इसका वित्तीय भार अंततः मध्यम वर्ग पर ही पड़ता है। जब पेट्रोल-डीजल महंगा होता है, तो परिवहन लागत (Logistics Cost) बढ़ जाती है, जिससे फल, सब्जी और अनाज जैसी बुनियादी जरूरतें महंगी हो जाती हैं।
सरकार इस वृद्धि को कितना नियंत्रित कर पाती है ताकि आम आदमी का दम न निकले। यदि वेस्ट एशिया में युद्ध विराम नहीं होता, तो आने वाला जून और जुलाई का महीना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
बड़ी बातें एक नजर में
कमर्शियल गैस: ₹994 की रिकॉर्ड वृद्धि।
पेट्रोल-डीजल: ₹4-₹5 बढ़ने की प्रबल संभावना।
रुपया: ₹95 प्रति डॉलर के सर्वकालिक निचले स्तर पर।
कच्चा तेल: $115 के पार, युद्ध के कारण आपूर्ति संकट।