BREAKING :
पेट्रोल पंपों पर जल्द बदलने जा रहा है तेल भरने का पूरा तरीका, सरकार के इस बड़े फैसले के पीछे क्या है असली वजह? सनरूफ देगी ठंडक या बढ़ेगी मुसीबत? टेस्ला के इस नए आविष्कार ने ऑटोमोबाइल जगत में क्यों मचाई खलबली? रिलायंस-सेबी विवाद में 19 साल बाद सबसे बड़ा मोड़, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने सबको क्यों चौंकाया? COMEDK UGET Result 2026 Declared जारी हुआ कॉमेडके यूजीईटी का रिजल्ट, इस डायरेक्ट लिंक से तुरंत डाउनलोड करें स्कोरकार्ड Delhi Liquor Crisis शराब के शौकीनों को बड़ा झटका! हाई कोर्ट के इस एक फैसले से दिल्ली में नहीं मिलेंगी Chivas Regal और Absolut जानें पूरा मामला ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों पर अमेरिका की ऐसी कौन सी शर्त जिसने इजरायल की सुरक्षा के बीच खड़ा कर दिया नया सैन्य गतिरोध? होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के बाद पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर मंडराया बड़ा खतरा, जानें क्या है ट्रंप की चेतावनी! ​पेट की बीमारियों पर चिकित्सा विज्ञान का सबसे बड़ा खुलासा जानें कैसे AI और ये छोटे जीव मिलकर बदल देंगे इंसानी शरीर की पूरी सेहत! 12 राज्यों के लिए 10,021 करोड़ की भारी मंजूरी पर इस एक वजह से अटक सकता है अगली किश्तों का काम ब्रह्मांडीय उलटफेर जून 2026 में गुरु-शनि की खतरनाक युगलबंदी क्या दुनिया में आने वाला है बड़ा भौकाल

चुनाव की कड़वाहट एक संक्षिप्त हस्तमिलाप और केरल की नई सियासत

चुनाव की कड़वाहट एक संक्षिप्त हस्तमिलाप और केरल की नई सियासत

तिरुवनंतपुरम: राजनीति में कई बार सबसे शक्तिशाली बयान बिना कुछ बोले दिए जाते हैं. गुरुवार को जब 16वीं केरल विधानसभा के उद्घाटन सत्र की कार्यवाही शुरू हुई, तो पूरे सदन की निगाहें अग्रिम पंक्ति की एक खाली होती जा रही बेंच और ऊंचे पोडियम पर टिकी थीं. क्षण भर पहले तक जो माहौल चुनावी कड़वाहट और तीखे बयानों की तपिश से झुलस रहा था, वह तब अचानक ठहर गया जब माकपा के कद्दावर नेता और अब सदन में विपक्ष के नेता पिनाराई विजयन ने नवनिर्वाचित विधायक के रूप में शपथ लेने के बाद कदम आगे बढ़ाए. पोडियम पर प्रोटेम स्पीकर की कुर्सी पर उनके ठीक सामने कोई अजनबी नहीं, बल्कि छह दशकों तक उनके वैचारिक हमसफर रहे और अब 'बागी' बन चुके जी. सुधाकरन खड़े थे. दोनों ने हाथ मिलाया—एक संक्षिप्त, औपचारिक स्पर्श, जिसने हालिया इतिहास के सबसे तीखे राजनीतिक गतिरोध पर सौहार्द का एक प्रतीकात्मक पर्दा डाल दिया.

विजयन, जिन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए कुछ ही सप्ताह पहले जनसभाओं में सुधाकरन के पार्टी छोड़ने को मलयालम के अत्यंत कड़े शब्द 'चेत्ताथराम' (घोर राजनीतिक विश्वासघात) से नवाजा था, उनके चेहरे पर एक गंभीर तटस्थता थी. वहीं, सात दशक के जीवन का लंबा सफर तय कर चुके सुधाकरन के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी, जिसमें सत्ता को हराने का संतोष भी था और अपने पुराने दल के बिखरने की टीस भी. दोनों नेताओं के बीच का यह हस्तमिलाप केवल संसदीय शिष्टाचार नहीं था; यह केरल की बदलती राजनीतिक हवाओं का एक मूक गवाह था.

पॉलिटिकल नोटबुक: साठ साल का सफर और एक मोड़
"चुनावी समर के ठीक पहले जी. सुधाकरन का माकपा से अलग होना केवल एक सीट का विवाद नहीं था. यह अलाप्पुझा की उस लाल धरती के अंतःकरण में दरार थी, जहां सुधाकरन ने अपने जीवन के 60 से अधिक साल कम्युनिस्ट आंदोलन को सींचने में लगा दिए थे. अंबालापुझा निर्वाचन क्षेत्र से चार बार के विधायक रहे सुधाकरन ने इस बार कांग्रेस नीत यूडीएफ के मौन समर्थन से स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा और माकपा के मजबूत गढ़ में सेंध लगाते हुए सिटिंग विधायक एच. सलाम को 27,935 मतों के भारी अंतर से शिकस्त दे दी. यह जीत केवल एक विधायक की नहीं, बल्कि एक पुराने कॉमरेड की उस नाराजगी की गूंज थी जिसे पार्टी आलाकमान सुन नहीं सका."

वैचारिक दरिद्रता का संकट सुधाकरन का तीखा आत्ममंथन

शपथ ग्रहण की इस औपचारिक शांति के पीछे की वैचारिक कड़वाहट तब खुलकर सामने आ गई, जब सदन की कार्यवाही के बाद सुधाकरन ने माकपा की राष्ट्रीय स्थिति पर गहरा और बेबाक विश्लेषण साझा किया. उनके सुरों में कोई व्यक्तिगत गुस्सा नहीं, बल्कि एक वैचारिक दार्शनिक की चिंता थी. उन्होंने पश्चिम बंगाल का संदर्भ देते हुए कहा, 'बंगाल में जहां कम्युनिस्ट मोर्चे ने ३५ वर्षों तक एकछत्र राज किया, और त्रिपुरा में जहां २७ वर्षों तक लाल झंडा बुलंद रहा, वहां आज पार्टी का नामोनिशान मिटने की कगार पर क्यों है? केंद्रीय समिति ने कभी भी खुलकर इस ऐतिहासिक पतन का कारण जनता के सामने स्पष्ट नहीं किया.

Must Read ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों पर अमेरिका की ऐसी कौन सी शर्त जिसने इजरायल की सुरक्षा के बीच खड़ा कर दिया नया सैन्य गतिरोध? ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों पर अमेरिका की ऐसी कौन सी शर्त जिसने इजरायल की सुरक्षा के बीच खड़ा कर दिया नया सैन्य गतिरोध?

सुधाकरन का सबसे बड़ा प्रहार माकपा की वर्तमान कार्यशैली पर था. उन्होंने कहा कि केरल में भी नेतृत्व ने इतिहास से कोई सबक नहीं लिया. पार्टी आज एक ऐसे रास्ते पर चल पड़ी है जो न तो पूरी तरह कम्युनिस्ट है और न ही बुर्जुआ (पूंजीवादी); यह एक दिशाहीन और अर्थहीन विचलन है जो अनिवार्य रूप से तबाही की ओर ले जाता है. उन्होंने इसे 'विचारधारा की दरिद्रता और दर्शन का अभाव' करार दिया.

आंकड़ों के आईने में केरल चुनाव 2026: एक ऐतिहासिक बदलाव

केरल की प्रबुद्ध जनता ने इस बार पारंपरिक रूप से हर पांच साल में सत्ता बदलने के अपने रिवाज को न केवल कायम रखा, बल्कि वामपंथ के अभेद्य किलों को पूरी तरह ढहा दिया. चुनावों के अंतिम सांख्यिकीय आंकड़े राज्य में एक नई राजनीतिक धुरी के उदय की कहानी बयां करते हैं:

राजनीतिक गठबंधन / दल प्राप्त सीटें (2026) सीटों का प्रतिशत जमीनी हकीकत और राजनीतिक प्रभाव
यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) 102 72.8% वी. डी. सतीसन के नेतृत्व में प्रचंड बहुमत, अल्पसंख्यकों और युवाओं का एकमुश्त समर्थन।
लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) 35 25.0% इतिहास की सबसे करारी हार; मध्य केरल और तटीय इलाकों में पारंपरिक कैडर वोट बैंक खिसका।
भारतीय जनता पार्टी (BJP) 03 2.1% पहली बार केरल विधानसभा के भीतर त्रिकोणीय उपस्थिति दर्ज कराने में सफल, वोट शेयर में वृद्धि।

इस नई विधायी व्यवस्था के तहत इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के नवनिर्वाचित विधायक वी. ई. अब्दुल गफूर ने सबसे पहले सदन के सदस्य के रूप में शपथ ली. इससे पूर्व, १९ मई को ही मुख्यमंत्री वी. डी. सतीसन के नेतृत्व में २१ सदस्यीय नए मंत्रिमंडल का शपथ ग्रहण संपन्न हो चुका है, जिसके सामने अब केरल की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने की बड़ी चुनौती है.

केरल की नई बिसात पर शह और मात का खेल 

शपथ ग्रहण के इस पहले अध्याय के संपन्न होने के बाद, आने वाले दिन केरल की राजनीति के भविष्य के लिए नए समीकरण तय करने वाले हैं:

Also Read सदन में शोर नहीं तर्कों से कैसे हारी थी ब्रिटिश सत्ता? ओम बिरला ने दिल्ली विधानसभा से जारी किए ऐतिहासिक पन्ने अब AI करेगा मदद सदन में शोर नहीं तर्कों से कैसे हारी थी ब्रिटिश सत्ता? ओम बिरला ने दिल्ली विधानसभा से जारी किए ऐतिहासिक पन्ने अब AI करेगा मदद
  1. स्पीकर और डिप्टी स्पीकर का त्रिकोणीय चुनाव (22 मई): 22 मई को होने वाला विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव सामान्य औपचारिकता नहीं रहेगा. हालांकि यूडीएफ के पास 102 सीटों का स्पष्ट बहुमत है और उन्होंने अपने सबसे अनुभवी चेहरे तिरुवनंतूर राधाकृष्णन को मैदान में उतारा है, लेकिन इस बार मुकाबला दिलचस्प होने जा रहा है.
  2. भाजपा का पहला विधायी कदम: इतिहास में पहली बार तीन सीटें जीतने वाली भाजपा ने सदन के भीतर अपनी रणनीतिक आक्रामकता का संकेत दे दिया है. प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर की मौजूदगी में भाजपा प्रत्याशी गोपाकुमार ने अध्यक्ष पद के लिए अपना नामांकन पत्र दाखिल किया है. भले ही आंकड़े उनके पक्ष में न हों, लेकिन यह कदम यह दिखाने के लिए है कि भाजपा सदन के भीतर मूकदर्शक बनकर नहीं बैठने वाली.
  3. विपक्ष के नेता के रूप में विजयन की नई परीक्षा: पिछले एक दशक से सत्ता के शीर्ष पर रहे पिनाराई विजयन के लिए नेता प्रतिपक्ष (LoP) की भूमिका किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगी. उन्हें न केवल सदन के भीतर यूडीएफ की आक्रामक नीतियों का सामना करना होगा, बल्कि पार्टी के भीतर उठ रहे असंतोष के सुरों और वैचारिक भटकाव के आरोपों का जवाब भी तलाशना होगा.
  4. जमीनी बदलाव की आहट: सुधाकरन जैसे जमीनी नेताओं का कांग्रेस के सहयोग से जीतना यह दर्शाता है कि केरल में अब पार्टी लाइन से परे जाकर व्यक्तिगत प्रभाव और क्षेत्रीय समीकरण हावी हो रहे हैं. आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या अन्य असंतुष्ट वामपंथी नेता भी इस नए रास्ते की ओर आकर्षित होते हैं.

लोकतंत्र की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसकी इमारत बयानों की कड़वाहट से नहीं, बल्कि संस्थागत मर्यादाओं से चलती है. विजयन और सुधाकरन के बीच मिलाया गया वह हाथ इस बात का प्रतीक है कि चुनावी मंचों पर भाषा चाहे कितनी भी अमर्यादित क्यों न हो जाए, संविधान की छत्रछाया में आकर हर किसी को लोकतंत्र के व्याकरण का पालन करना ही पड़ता है. केरल की जनता ने एक बहुत ही स्पष्ट और विचारशील जनादेश दिया है. जहां उन्होंने कांग्रेस नीत गठबंधन को शासन की चाबी सौंपी है, वहीं भाजपा को प्रवेश द्वार देकर वामपंथ को अपनी जड़ों की ओर लौटने की सख्त चेतावनी दी है. आने वाले पांच साल यह तय करेंगे कि क्या केरल का कम्युनिस्ट आंदोलन खुद को पुनर्जीवित कर पाता है या फिर यह हस्तमिलाप वास्तव में एक युग के ढलने की शुरुआत थी.

Input: ANI

Admin Desk

Admin Desk

I am senior editor of this News Portal. Me and my team verify all news with trusted sources and publish here.

Home Shorts

Categories