एक फोन कॉल, एक इनकार और एक संवैधानिक सवाल — राघव चड्ढा की अगुवाई में AAP के सात राज्यसभा सांसदों ने BJP का दामन थाम लिया। पंजाब से छह गए, एक टिका रहा। लेकिन असली लड़ाई अब संसद के बाहर — अदालत में होगी।
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सात सांसद, एक घोषणा, एक बड़ा सवाल
शुक्रवार को दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई जिसने AAP की राज्यसभा उपस्थिति को झटके में आधा कर दिया। राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक कुमार मित्तल समेत सात सांसदों ने BJP में विलय का ऐलान किया। सातों में से छह पंजाब से थे।
चड्ढा गुट का तर्क था कि AAP अपने सिद्धांतों से भटक गई" और नेतृत्व भ्रष्ट हो चुका है। AAP ने पलटवार करते हुए इसे ऑपरेशन लोटस कहा BJP पर आरोप कि उसने यह तोड़फोड़ कराई।
लेकिन इस सियासी शोर के बीच एक सवाल दब गया क्या संविधान के तहत यह विलय वैध है ?
जो नहीं गए सीचेवाल और उनका साफ इनकार
पंजाब से AAP का एकमात्र सांसद जो इस पूरे घटनाक्रम से बाहर रहा बलबीर सिंह सीचेवाल। पद्मश्री से सम्मानित पर्यावरणविद्, जालंधर के आध्यात्मिक नेता।
शनिवार को उन्होंने मीडिया को बताया कि विक्रम साहनी ने फोन पर संपर्क किया था। कहा एक स्वतंत्र गुट बन रहा है, साइन करो। सीचेवाल का जवाब था मैंने मना कर दिया।
16 से 18 अप्रैल के संसद सत्र में उन्हें "चाय पर बुलाया" गया पहली बार। उन्होंने कहा यह न्योता पहले कभी नहीं आया था, और दल-बदल पर कोई सीधी बात नहीं हुई। जो कोई और कहे, वो झूठ है।
सीचेवाल को 2022 में CM भगवंत मान ने नामित किया था दिल्ली नेतृत्व ने नहीं। उन्होंने यह पद कई बार ठुकराने के बाद स्वीकार किया। राज्यसभा में पंजाब के सांसदों में उनकी उपस्थिति सबसे अधिक रही।
पंजाब में सबसे ताकतवर अब बाहर
सीचेवाल ने इस पूरी टूट का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह उठाया कि जो लोग गए, वो पंजाब में सबसे प्रभावशाली थे।
संदीप पाठक पार्टी संगठन संभालते थे। राघव चड्ढा करीब दो-तीन साल तक प्रशासनिक मोर्चे के केंद्र में रहे। चंडीगढ़ के सेक्टर 2 का हाउस नंबर 50 जो असल में पंजाब CM का कैंप ऑफिस है चड्ढा का निवास बन गया था। सीचेवाल के मुताबिक उस वक्त सारे अफसरों की निगाह उसी बंगले पर रहती थी।
CM भगवंत मान ने अप्रैल की शुरुआत में ही कहा था कि जो "कोठी नंबर 50 में सत्ता के फल भोगता रहा" वो आज पार्टी में घुटन महसूस कर रहा है। AAP के लोकसभा सांसद मलविंदर सिंह कांग ने भी माना कि चड्ढा का पंजाब में "बहुत ज्यादा दबदबा" था।
यह विडंबना किसी से छुपी नहीं कि जो नेता पंजाब की नीतियों के केंद्र में थे, वे अब उस पार्टी में हैं जिसके खिलाफ वो चुने गए थे।
दल-बदल कानून सरल भाषा में असली पेच
संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून कहती है कि किसी सांसद को अयोग्यता से बचने के लिए दो शर्तें एक साथ पूरी होनी चाहिए।
पहली: मूल पार्टी का किसी दूसरी पार्टी में वास्तविक विलय हो।
दूसरी: उस पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सांसद इस विलय से सहमत हों।
2003 से पहले एक अलग रास्ता था जिसमें एक तिहाई सांसद अलग गुट बनाकर बच सकते थे। वह प्रावधान हटाया जा चुका है।
यहां बड़ा सवाल यह है: AAP ने BJP में विलय नहीं किया है। सिर्फ सात सांसदों ने खुद को विलय घोषित किया है। कानून की भाषा में if and only if यानी जब तक मूल पार्टी खुद विलय न करे यह छूट लागू नहीं होती।
सरल शब्दों में: सांसद पार्टी नहीं छोड़ सकते और उसे पार्टी का विलय नहीं कह सकते। यह दल-बदल की श्रेणी में आता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस व्याख्या पर अब तक कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया और यही कानूनी खालीपन इन सांसदों के लिए अभी एकमात्र ढाल है।
क्या बदला किस पर पड़ेगा असर
राज्यसभा में संख्याबल: AAP के पंजाब से अब सिर्फ सीचेवाल बचे हैं। दिल्ली से संजय सिंह और एनडी गुप्ता पार्टी में हैं। कुल मिलाकर राज्यसभा में AAP की स्थिति काफी कमजोर हुई है, जबकि BJP का पलड़ा भारी हुआ है।
राज्यसभा में विपक्ष की संख्या कम होने का मतलब है सरकारी विधेयकों पर कम बहस, कम विरोध, कम जवाबदेही। यह संसदीय लोकतंत्र के लिए सीधी चुनौती है।
पंजाब की जनता पर असर: जिन सांसदों ने किसान आंदोलन, नशे की समस्या और बेरोजगारी पर आवाज उठाने का वादा करके वोट लिया, वे अब उस पार्टी में हैं जिसके खिलाफ मैदान में उतरे थे। यह जनता के भरोसे का सीधा सवाल है।
AAP के लिए चुनावी दबाव: पंजाब में अगला विधानसभा चुनाव नजदीक है। इस तरह की टूट से पार्टी की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचता है, भले ही सरकार स्थिर रहे।
संस्थागत सवाल: दल-बदल मामलों में फैसला सभापति या स्पीकर करते हैं जो खुद किसी न किसी पार्टी से जुड़े होते हैं। चुनाव आयोग, दिनेश गोस्वामी समिति (1990) और विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट (1999) तीनों दशकों से एक स्वतंत्र न्यायाधिकरण की मांग करते रहे हैं। यह मामला उस पुरानी बहस को फिर केंद्र में ले आया है।
अदालत याचिका और राजनीति
AAP अयोग्यता याचिका दाखिल कर सकती है राज्यसभा सभापति जगदीप धनखड़ के सामने। वहां से मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है।
सीचेवाल ने "गद्दार" शब्द से परहेज किया। गुरबाणी से कहा नानक फिका बोलिए, तन मन फिका होय। जो गए उनके लिए वाहेगुरु उन्हें चढ़दी कला में रखे। BJP के करीब आने पर उनका जवाब था अगर कोई आता भी, तो हम आगे भेज देते इसीलिए वो आते नहीं।
काली बेईं नदी की सफाई के लिए पद्मश्री पाने वाले सीचेवाल अब पंजाब से AAP के इकलौते राज्यसभा सांसद हैं। उन्होंने कहा कि दल-बदल गुट ने कभी उन्हें अपना सहयोगी नहीं माना और यह कि संसद में उन्हें बिल पर बोलने से रोका गया।
यह बयान परोक्ष रूप से चड्ढा की ओर इशारा था, जो 2 अप्रैल तक राज्यसभा में AAP के उपनेता थे।
अब नजर राज्यसभा सभापति के फैसले सुप्रीम कोर्ट की संभावित सुनवाई और पंजाब की बदलती सियासत पर टिकी रहेगी क्योंकि यह टूट सिर्फ AAP की नहीं दल-बदल कानून की असली परीक्षा भी है।