पटना: बिहार की सियासत के बारे में एक बात मशहूर है—यहाँ जो दिखता है, वो होता नहीं; और जो होता है, उसकी आहट भी किसी को नहीं मिलती। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीति को समझना अक्सर बड़े-बड़े दिग्गजों के लिए टेढ़ी खीर साबित हुआ है। ताज़ा घटनाक्रम में, जेडीयू (JDU) ने जिस तरह से अपनी राजनीतिक गोटियां सेट करना शुरू किया है, उसने न केवल पटना से लेकर दिल्ली तक के गलियारों में खलबली मचा दी है, बल्कि बीजेपी (BJP) के रणनीतिकारों की 'धड़कनें' भी बढ़ा दी हैं।
शुरुआत में सब कुछ 'ऑल इज वेल' जैसा दिख रहा था, लेकिन जेडीयू की नई मांगों ने बिहार एनडीए के भीतर एक ऐसी सियासी तपिश पैदा कर दी है, जिसका धुआं अब साफ नजर आने लगा है। चर्चा है कि नीतीश कुमार अब 'छोटे भाई' की भूमिका से पूरी तरह बाहर निकलकर 'बड़े भाई' वाली धमक वापस पाना चाहते हैं।
विधायक दल की बैठक और हैरान करने वाली मांग
बिहार की राजनीति में असली हलचल तब शुरू हुई जब 20 अप्रैल को पटना में जेडीयू विधानमंडल दल की अहम बैठक हुई। इस बैठक की खास बात यह थी कि खुद नीतीश कुमार मंच पर मौजूद थे। सूत्रों की मानें तो इस बंद कमरे की मीटिंग में विधायकों ने जो सुर छेड़े, उन्हें नीतीश कुमार का मूक समर्थन प्राप्त था।
नीतीश कुमार के बेहद करीबी और पूर्व मंत्री श्रवण कुमार के एक बयान ने आग में घी डालने का काम किया है। उन्होंने मीडिया के सामने स्पष्ट कर दिया कि इस बार मंत्रिमंडल विस्तार में जेडीयू का पलड़ा भारी रहने वाला है। उनका दावा है कि पिछली बार के मुकाबले इस बार जेडीयू कोटे से ज्यादा मंत्री शपथ लेंगे। यह सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि बीजेपी नेतृत्व के लिए एक सीधा संकेत था कि अब नीतीश कुमार सीटों के समझौते के बाद विभागों के बँटवारे में दबने वाले नहीं हैं।
विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी प्रतिष्ठा का नया अखाड़ा
जेडीयू की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली नजर विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) के पद पर है। बिहार की राजनीति में स्पीकर का पद कितना महत्वपूर्ण है, यह पिछले कुछ सालों के सियासी उठापटक से समझा जा सकता है। वर्तमान में बीजेपी के वरिष्ठ नेता प्रेम कुमार इस कुर्सी पर काबिज हैं। प्रेम कुमार अति पिछड़ा वर्ग से आते हैं और गया से लगातार जीतते आ रहे हैं।
बीजेपी के लिए मुसीबत यह है कि प्रेम कुमार का कद और उनकी जातीय पहचान (अति पिछड़ा), पार्टी के कोर वोट बैंक का हिस्सा है। अगर नीतीश कुमार स्पीकर की कुर्सी अपनी झोली में खींचते हैं, तो बीजेपी के पास प्रेम कुमार को 'एडजस्ट' करने का कोई ठोस विकल्प फिलहाल नजर नहीं आता। जेडीयू का तर्क है कि सदन के सुचारू संचालन और भविष्य की किसी भी 'अनहोनी' को रोकने के लिए स्पीकर का पद मुख्यमंत्री की पार्टी के पास होना चाहिए।
33 मंत्रियों की लिस्ट और शक्ति संतुलन
कहा जा रहा है कि बिहार कैबिनेट में संभावित 33 मंत्रियों की जो सूची तैयार हो रही है, उसमें जेडीयू अधिक मलाईदार विभाग और अधिक संख्या चाहती है। पहले चर्चा थी कि विभागों की अदला-बदली (Swap) होगी, लेकिन अब खबर है कि जेडीयू ने नए सिरे से अपनी दावेदारी पेश की है।
संख्या बल का खेल: जेडीयू के पास फिलहाल 85 विधायकों का समर्थन है। हालांकि बीजेपी के पास 89 विधायक हैं, लेकिन नीतीश कुमार की स्वीकार्यता और 'किंगमेकर' वाली छवि के सामने बीजेपी को झुकना पड़ सकता है।
रणनीतिक आक्रामकता: पिछले कुछ समय से रक्षात्मक खेल रही जेडीयू अब पूरी तरह से आक्रामक मोड में है। पार्टी के भीतर यह संदेश साफ है कि अगर बिहार में एनडीए को एकजुट रखना है, तो जेडीयू की शर्तों को नजरअंदाज करना बीजेपी के लिए आत्मघाती हो सकता है।
बीजेपी के भीतर अनजाना डर
दिल्ली से लेकर पटना तक बीजेपी के रणनीतिकार इस समय गहरे मंथन में हैं। बीजेपी को इस बात का अहसास है कि नीतीश कुमार जब जिद पर अड़ते हैं, तो वह पीछे नहीं हटते। हाल ही में हमने देखा कि सम्राट चौधरी को डिप्टी सीएम बनाने के फैसले पर कैसे बीजेपी के तमाम विधायकों ने भी मुहर लगा दी थी। बीजेपी को डर है कि अगर नीतीश कुमार ने अपनी मांगों को 'प्रतिष्ठा' का प्रश्न बना लिया, तो गठबंधन के भीतर दरारें आ सकती हैं।
बीजेपी के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ उन्हें अपने कार्यकर्ताओं को संतुष्ट रखना है कि वे 'झुक' नहीं रहे हैं, और दूसरी तरफ नीतीश कुमार को साथ लेकर चलना है ताकि विधानसभा चुनाव और आने वाले समय में कोई बड़ी टूट न हो।
क्या होगा अगला कदम ?
सूत्रों का कहना है कि आने वाले 48 से 72 घंटे बिहार की राजनीति के लिए बेहद निर्णायक होने वाले हैं। नीतीश कुमार की 'हाथी चाल' ने बिसात बिछा दी है। अब देखना यह है कि बीजेपी का आलाकमान इस 'प्रेशर पॉलिटिक्स' का जवाब कैसे देता है।
क्या बीजेपी अपने अनुभवी नेता प्रेम कुमार की कुर्सी को बचा पाएगी? या फिर नीतीश कुमार एक बार फिर साबित कर देंगे कि बिहार की सत्ता की चाबी आज भी उन्हीं के पास है और 'बड़े भाई' की भूमिका में वही असली खिलाड़ी हैं। फिलहाल, पटना की हवाओं में भारीपन है और एनडीए के दोनों दलों के बीच जारी यह 'शीतयुद्ध' किसी बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहा है।
बिहार में मंत्रियों की संख्या और स्पीकर पद को लेकर जो खींचतान शुरू हुई है, वह केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं है। यह 2025 की चुनावी तैयारियों और गठबंधन के भीतर अपनी ताकत दिखाने की एक सोची-समझी कोशिश है। नीतीश कुमार ने संकेत दे दिए हैं—अब गेंद बीजेपी के पाले में है।