बेंगलुरु: कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने राज्य की आबकारी नीति (Excise Policy) में एक ऐसा क्रांतिकारी बदलाव किया है, जिसकी चर्चा पूरे देश के बिजनेस और सोशल सर्कल्स में हो रही है। हाल ही में जारी 'कर्नाटक एक्साइज (संशोधन) नियम, 2026' के ड्राफ्ट नोटिफिकेशन ने यह साफ कर दिया है कि राज्य अब शराब पर टैक्स लगाने के अपने पुराने ढर्रे को पूरी तरह बदलने जा रहा है। 18 अप्रैल को जारी इस नोटिफिकेशन के बाद अब शराब की बोतलों पर टैक्स उसकी मात्रा (Volume) के बजाय उसमें मौजूद शुद्ध अल्कोहल (Strength) के आधार पर वसूला जाएगा।
क्या है Alcohol-in-Beverage (AIB) टैक्स स्ट्रक्चर ?
आमतौर पर अब तक भारत के अधिकांश राज्यों में शराब पर टैक्स बोतल की साइज और उसकी कैटेगरी के आधार पर लगता था। लेकिन कर्नाटक सरकार द्वारा पेश किया गया AIB (अल्कोहल-इन-बेवरेज) मॉडल इस धारणा को बदल देता है।
इस नए सिस्टम का मुख्य सिद्धांत यह है कि "टैक्स उस पानी या तरल पर नहीं होना चाहिए जिसमें शराब मिली है, बल्कि टैक्स उस शुद्ध अल्कोहल पर होना चाहिए जो इंसान के शरीर में जा रहा है।" उदाहरण के तौर पर, यदि एक बीयर में 5% अल्कोहल है और किसी हार्ड लिकर (जैसे व्हिस्की) में 42% अल्कोहल है, तो अब टैक्स का गणित इसी प्रतिशत के आधार पर तय होगा। यह मॉडल विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा सुझाया गया है और विकसित देशों में इसे ही 'गोल्ड स्टैंडर्ड' माना जाता है।
मुख्यमंत्री का विजन और बजट 2026-27 के वादे
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने पिछले महीने राज्य का बजट पेश करते समय ही इस बात के संकेत दे दिए थे कि वह एक्साइज सेक्टर में बड़े सुधार लाना चाहते हैं। कर्नाटक सरकार का लक्ष्य साल 2026-27 के दौरान राजस्व संग्रहण (Revenue Collection) को अधिकतम करना है, लेकिन इसके साथ ही वे एक 'सामाजिक जिम्मेदारी' भी निभाना चाहते हैं। सरकार का मानना है कि इस टैक्स स्ट्रक्चर से लोग ज्यादा नशीली शराब के बजाय कम नशीले पेय पदार्थों (जैसे बीयर या वाइन) की ओर आकर्षित होंगे, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव कम होंगे।
3. ब्रूअर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BAI) ने क्यों किया स्वागत ?
इस फैसले का सबसे ज्यादा स्वागत 'ब्रूअर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया' ने किया है। एसोसिएशन के डायरेक्टर जनरल, विनॉड गिरी ने इसे भारतीय शराब उद्योग के लिए एक 'वॉटरशेड मोमेंट' (ऐतिहासिक क्षण) बताया है।
BAI के अनुसार, यह सुधार न केवल उद्योग के लिए फायदेमंद है, बल्कि यह सरकार की दूरदर्शिता को भी दर्शाता है। विनोद गिरी का कहना है कि कर्नाटक ने राजस्व की भूख और जन स्वास्थ्य के बीच एक बेहतरीन संतुलन बिठाया है। हालांकि, BAI ने यह भी कहा है कि वे बीयर के स्लैब को लेकर कुछ अतिरिक्त सुझाव सरकार को देंगे ताकि कम अल्कोहल वाले ड्रिंक्स को और अधिक किफायती बनाया जा सके।
ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (Ease of Doing Business) की दिशा में कदम
यह नया नोटिफिकेशन केवल टैक्स तक ही सीमित नहीं है। इसमें उद्योग जगत को राहत देने के लिए कई बड़े प्रशासनिक बदलाव भी किए गए हैं:
कीमतों का नियंत्रण (Price Deregulation): अब तक सरकार ही यह तय करती थी कि किस ब्रांड की कीमत क्या होगी। अब सरकार धीरे-धीरे इस एडमिनिस्टर्ड प्राइस फिक्सेशन से पीछे हट रही है, जिससे कंपनियों को बाजार के हिसाब से कीमतें तय करने की आजादी मिलेगी।
डिजिटल और ऑटोमेशन: मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंसों के लिए अब दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने होंगे। सरकार ने 'ऑटो-रिन्यूअल' और ऑनलाइन अप्रूवल सिस्टम लागू कर दिया है।
24/7 परिचालन: डिस्टिलरी और ब्रुअरीज को अब दिन-रात (24 घंटे) काम करने की अनुमति होगी, जिससे उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
टूरिज्म और क्राफ्ट बीयर: कर्नाटक अपनी 'पब कैपिटल' बेंगलुरु की छवि का फायदा उठाना चाहता है। अब ब्रुअरीज को पर्यटन केंद्रों के रूप में विकसित करने की योजना है, जिससे राज्य में निवेश और सैलानी दोनों बढ़ेंगे।
आम उपभोक्ताओं की जेब पर क्या असर होगा ?
एक बड़ा सवाल जो हर किसी के मन में है— "क्या दारू महंगी हो जाएगी ?
इसका जवाब थोड़ा तकनीकी है। एआईबी (AIB) मॉडल लागू होने से उन शराबों के दाम बढ़ सकते हैं जिनमें अल्कोहल का प्रतिशत बहुत अधिक होता है। वहीं, लाइट बीयर या लो-अल्कोहल वाइन जैसी श्रेणियों में टैक्स का बोझ कम रह सकता है। सरकार का सीधा संदेश है: "ज्यादा नशा, ज्यादा टैक्स
अन्य राज्यों के लिए एक नजीर (Example)
कर्नाटक भारत का पहला राज्य बन गया है जिसने इतनी मजबूती से एआईबी मॉडल को अपनाया है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह मॉडल कर्नाटक में सफल रहता है (जो कि देश के सबसे बड़े शराब मार्केट में से एक है), तो महाराष्ट्र, दिल्ली और हरियाणा जैसे राज्य भी जल्द ही इसे लागू कर सकते हैं। इससे पूरे देश में एक समान और पारदर्शी एक्साइज ड्यूटी सिस्टम की नींव रखी जा सकती है।
क्या चुनौतियां आ सकती हैं ?
किसी भी बड़े सुधार के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी होती हैं। नए नियमों को लागू करने के लिए एक्साइज विभाग को अपने पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर को अपडेट करना होगा। कंपनियों को अपनी लेबलिंग और बिलिंग सिस्टम में बदलाव करने होंगे। इसके अलावा, बॉर्डर पर तस्करी (Smuggling) को रोकना भी एक चुनौती होगी, क्योंकि अगर पड़ोसी राज्यों में पुराने सिस्टम से शराब सस्ती मिलती रही, तो राजस्व का नुकसान हो सकता है।
एक आधुनिक इकोनॉमी की ओर कर्नाटक
कर्नाटक का यह कदम केवल शराब की बोतलों पर टैक्स बढ़ाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह एक मॉडर्न इकोनॉमिक पॉलिसी का हिस्सा है। जहाँ सरकार व्यापार को आसान बना रही है, वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिक आधार पर टैक्स वसूल रही है। अगर यह प्रयोग सफल रहता है, तो यह कर्नाटक की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा और साथ ही शराब के सेवन में 'मॉडरेशन' (संयम) की संस्कृति को बढ़ावा देगा।