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मुर्शिदाबाद में बरसे पत्थर, क्या चुनाव के नाम पर सिर्फ दहशत का खेल हो रहा है?

मुर्शिदाबाद में बरसे पत्थर, क्या चुनाव के नाम पर सिर्फ दहशत का खेल हो रहा है?

पश्चिम बंगाल में चुनाव हो और हिंसा की खबरें न आएं, ऐसा लगता है अब मुमकिन नहीं रहा। गुरुवार को जब मुर्शिदाबाद की जनता अपने भविष्य को चुनने के लिए घरों से बाहर निकल रही थी, उसी वक्त सड़कों पर पत्थर और लाठियां चल रही थीं। पहले ही चरण की वोटिंग में जो हुआ, उसने एक बार फिर प्रशासन के दावों की पोल खोल दी है। भारतपुर के विधायक हुमायूं कबीर, जिन्होंने हाल ही में ममता बनर्जी की पार्टी से नाता तोड़कर अपनी अलग राह चुनी है, आज खुद अपनी जान बचाने के लिए गाड़ी में दुबके नजर आए।

कैसे शुरू हुआ ये पूरा बवाल ?

मामला मुर्शिदाबाद के नौदा विधानसभा इलाके का है। खबर है कि शिबनगर गांव के एक पोलिंग बूथ पर जैसे ही हुमायूं कबीर अपनी गाड़ी से पहुंचे, वहां पहले से मौजूद भीड़ उग्र हो गई। चश्मदीदों की मानें तो कबीर के पहुंचते ही "गो बैक" के नारे लगने लगे। देखते ही देखते ये नारेबाजी पत्थरबाजी में बदल गई।

हैरानी की बात ये है कि हुमायूं कबीर को उनकी ही पुरानी पार्टी यानी TMC के कार्यकर्ताओं ने घेर लिया। उनकी सफेद रंग की गाड़ी के शीशे पत्थरों से तोड़ दिए गए। कबीर के समर्थकों ने जब उन्हें बचाने की कोशिश की, तो उन पर बांस के डंडों से हमला किया गया। वीडियो में साफ दिख रहा है कि कबीर अपनी गाड़ी से बाहर तक नहीं निकल पा रहे थे। सोचने वाली बात ये है कि अगर एक विधायक स्तर का नेता सुरक्षित नहीं है, तो उस आम आदमी का क्या होगा जो सिर्फ अपना वोट डालने की हिम्मत जुटा रहा है?

रात में बमबारी सुबह पथराव

ये हिंसा अचानक नहीं हुई। इसकी सुगबुगाहट बुधवार रात से ही शुरू हो गई थी। नौदा के शिवनगर प्राइमरी स्कूल के पास बुधवार की रात को ही देसी बम फेंके गए थे। इस धमाके में एक महिला घायल हुई है, जिसका कसूर सिर्फ इतना था कि वो उस वक्त वहां से गुजर रही थी।

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घायल महिला का कहना है, "मैं रात 8 बजे नमाज पढ़कर वापस आ रही थी, तभी दो लड़के आए और मेरे पैरों के पास बम फेंक दिया।" अब सवाल ये है कि मतदान केंद्र के पास रात में बम कहां से आए? क्या ये वोटरों को डराने का एक पुराना तरीका है?

आरोपों का खेल 

राजनीति में जब पत्थर चलते हैं, तो उसके बाद आरोपों की बारिश भी तेज हो जाती है। हुमायूं कबीर का कहना है कि TMC जानबूझकर उन्हें और उनके वोटरों को डरा रही है क्योंकि उन्हें हार का डर सता रहा है। उन्होंने कहा, "मैंने अपने समर्थकों को शांत रहने को कहा है। मेरा मकसद लड़ाई-झगड़ा करना नहीं, बल्कि शांति से चुनाव लड़ना है।"

वहीं दूसरी ओर, TMC के सांसद अबू ताहिर खान ने इन सभी आरोपों को सिरे से नकार दिया है। उनका कहना है कि हुमायूं कबीर के लोग ही इलाके में अशांति फैला रहे हैं और बमबारी में भी उन्हीं का हाथ है। अब सच क्या है, ये तो जांच के बाद ही पता चलेगा, लेकिन इस खींचतान में पिस तो मुर्शिदाबाद की आम जनता ही रही है।

डोमकल में डर का पहरा

सिर्फ नौदा ही नहीं, डोमकल इलाके से भी डराने वाली खबरें सामने आई हैं। रायपुर गांव के लोगों ने शिकायत की है कि सुबह से ही कुछ नकाबपोश और हथियारबंद लोग गलियों में घूम रहे थे। इनका मकसद साफ था—लोगों के मन में इतना डर बिठा देना कि वो बूथ तक जाने की हिम्मत ही न करें। चुनाव आयोग के पास ऐसी कई शिकायतें पहुंची हैं कि लोगों को जबरन घरों में रहने को कहा गया और वोट डालने से रोका गया। अब चुनाव आयोग ने इस पर रिपोर्ट मांगी है, लेकिन क्या रिपोर्ट मांगने से वो डर खत्म हो जाएगा जो लोगों के दिल में बैठ गया है?

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क्या हार के डर से हो रही है ये हिंसा ?

पश्चिम बंगाल का ये चुनाव इस बार बहुत दिलचस्प है। एक तरफ सत्ता पर काबिज होने की जंग है, तो दूसरी तरफ वजूद बचाने की लड़ाई। हुमायूं कबीर जैसे नेता, जो कभी TMC के अंदरूनी सिस्टम का हिस्सा थे, अब बागी होकर उनके सामने खड़े हैं। ऐसे में ये लड़ाई अब सिर्फ विचारधारा की नहीं, बल्कि 'इलाके के दबदबे' की बन गई है।

पुलिस का कहना है कि स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण में है। असिस्टेंट सुपरिटेंडेंट माजिद खान के मुताबिक, पुलिस ने भीड़ को हटाने के लिए हल्का लाठीचार्ज किया और अब वहां शांति है। लेकिन सवाल ये है कि क्या इसे वाकई शांति कहेंगे? टूटे हुए शीशे, अस्पताल में भर्ती घायल महिला और डरे हुए वोटर क्या शांति की निशानी हैं?

हर चुनाव में बंगाल से ऐसी ही तस्वीरें क्यों आती हैं? क्या चुनाव का मतलब सिर्फ जीत हासिल करना है, चाहे उसके लिए किसी का खून ही क्यों न बहाना पड़े? मुर्शिदाबाद की ये घटना एक चेतावनी है कि अगर सुरक्षा के इंतजाम पुख्ता नहीं किए गए, तो आने वाले चरणों में ये आग और बढ़ सकती है।

All photo credit :  the economic Times 

Admin Desk

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