आम आदमी पार्टी (AAP) के 'पोस्टर बॉय' माने जाने वाले राघव चड्ढा की पिछले कुछ हफ्तों की चुप्पी ने शुक्रवार को एक ऐसा राजनीतिक धमाका किया, जिसने दिल्ली से लेकर पंजाब तक की सियासत हिला दी है। राघव चड्ढा ने न केवल AAP का साथ छोड़ा, बल्कि अपने साथ 6 अन्य राज्यसभा सांसदों को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया। यह केवल एक इस्तीफा नहीं, बल्कि एक सुनियोजित 'मर्जर' (विलय) है, जिसने तकनीकी रूप से AAP के संसदीय वजूद को राज्यसभा में लगभग खत्म कर दिया है।
क्या है पूरा मामला
शुक्रवार की दोपहर जब राघव चड्ढा प्रेस कॉन्फ्रेंस करने आए, तो उनके चेहरे पर वही पुराना आत्मविश्वास था, लेकिन शब्दों में इस बार अपनी पुरानी पार्टी के लिए कड़वाहट घुली थी। राघव ने ऐलान किया कि वह और उनके साथ राज्यसभा के कुल 7 सांसद अब बीजेपी का हिस्सा हैं। उन्होंने संविधान की 10वीं अनुसूची (Anti-Defection Law) का हवाला देते हुए बताया कि चूंकि वे कुल 10 सांसदों में से दो-तिहाई (7 सांसद) हैं, इसलिए उन पर दल-बदल कानून लागू नहीं होगा और उनकी सदस्यता बरकरार रहेगी।
इस बगावत में राघव के साथ संदीप पाठक (AAP के चाणक्य माने जाने वाले), अशोक मित्तल (LPU के संस्थापक), पूर्व क्रिकेटर हरभजन सिंह, स्वाति मालिवाल, विक्रम साहनी और संजीव अरोड़ा जैसे बड़े नाम शामिल हैं। अब राज्यसभा में केजरीवाल की पार्टी के पास सिर्फ तीन सांसद—संजय सिंह, एनडी गुप्ता और संत बलबीर सिंह सीचेवाल ही बचे हैं।
भरोसे की दरार और डेमोशन
सियासी गलियारों में चर्चा है कि यह दरार रातों-रात नहीं आई। इसकी नींव तब पड़ी जब 2 अप्रैल को AAP नेतृत्व ने एक चौंकाने वाला फैसला लेते हुए राघव चड्ढा को राज्यसभा में 'डिप्टी लीडर' के पद से हटा दिया। उनकी जगह अशोक मित्तल को यह जिम्मेदारी दी गई। राघव के समर्थकों के लिए यह किसी 'सार्वजनिक अपमान' से कम नहीं था।
पार्टी के भीतर यह संदेश जाने लगा था कि जो राघव कभी केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद और पंजाब की जीत के सूत्रधार थे, उन्हें अब किनारे किया जा रहा है। राघव की लंबी खामोशी और पार्टी के कार्यक्रमों से उनकी दूरी ने पहले ही इशारा कर दिया था कि 'ऑल इज नॉट वेल'। बीजेपी नेताओं का राघव के भाषणों की तारीफ करना और केंद्र सरकार द्वारा उन्हें अचानक Z-कैटेगरी की सुरक्षा देना, इस स्क्रिप्ट के आखिरी पन्ने थे।
जांच एजेंसियों का साया और ऑपरेशन लोटस के आरोप
इस पूरे घटनाक्रम में एक दिलचस्प पहलू 'टाइमिंग' का भी है। 15 अप्रैल को ईडी (ED) ने अशोक मित्तल से जुड़ी संपत्तियों पर छापेमारी की थी। ठीक उसी समय राघव चड्ढा को केंद्र से हाई-लेवल सुरक्षा मिल रही थी। AAP ने इसे बीजेपी का 'डर्टी गेम' करार दिया है। संजय सिंह और मुख्यमंत्री भगवंत मान ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया कि बीजेपी ने डरा-धमकार और लालच देकर उनके सांसदों को तोड़ा है।
हालांकि, राघव का तर्क बिल्कुल अलग है। उन्होंने साफ कहा, "मैं सही आदमी था, जो गलत पार्टी में फंस गया था। जिस ईमानदारी की कसम खाकर AAP बनी थी, वह अब सिर्फ फाइलों में रह गई है।" अशोक मित्तल, जिन्हें AAP ने राघव की जगह दी थी, उनका खुद राघव के साथ खड़ा होना पार्टी के लिए सबसे बड़ा झटका साबित हुआ।
राज्यसभा में ताकत हुई आधी से भी कम
इस बगावत का सबसे बड़ा असर संसद के भीतर दिखेगा। राज्यसभा में AAP एक बड़ी ताकत हुआ करती थी, जो विपक्ष के गठबंधन 'INDIA' में अहम भूमिका निभाती थी। अब महज 3 सांसदों के साथ AAP के पास सदन में बोलने का समय और प्रभाव, दोनों ही बेहद कम हो जाएंगे।
पंजाब की राजनीति पर भी इसका गहरा असर पड़ना तय है। पंजाब से आने वाले 6 सांसदों का एक साथ टूटना मुख्यमंत्री भगवंत मान की लीडरशिप पर भी सवाल खड़े करता है। आने वाले 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले, बीजेपी ने इस सेंधमारी के जरिए पंजाब में अपनी जमीन मजबूत करने का एक बड़ा दांव चल दिया है।
पार्टी और नेताओं का आधिकारिक रुख
राघव चड्ढा: "पार्टी अब अपने सिद्धांतों से भटक गई है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले अब खुद सवालों के घेरे में हैं। मैंने अपनी जिंदगी के 15 साल इस पार्टी को दिए, लेकिन अब देशहित में बीजेपी के साथ जुड़ना जरूरी था।"
AAP (संजय सिंह): यह लोकतंत्र की हत्या है। बीजेपी ने एजेंसियों का डर दिखाकर हमारे साथियों को तोड़ा है। जनता इस गद्दारी का जवाब देगी।"
BJP (नितिन नबीन): मोदी जी के 'विकसित भारत' के विजन से प्रभावित होकर जमीन से जुड़े नेता हमारे साथ आ रहे हैं। हम राघव चड्ढा और उनके साथियों का स्वागत करते हैं।"
कानूनी लड़ाई
भले ही राघव चड्ढा ने दो-तिहाई बहुमत का दावा कर अपनी सीट बचाने की कोशिश की है, लेकिन AAP इसे आसानी से नहीं छोड़ेगी। पार्टी राज्यसभा सभापति के पास अयोग्यता (Disqualification) की याचिका दायर करने की तैयारी में है। कानून के जानकारों का मानना है कि 'मर्जर' की प्रक्रिया में तकनीकी पेंच फंस सकते हैं, क्योंकि सिर्फ विधायी दल का टूटना काफी नहीं होता, मूल पार्टी का भी विलय होना चाहिए—यही बहस का मुख्य मुद्दा होगा।
आने वाले दिनों में दिल्ली और पंजाब की राजनीति में और भी बड़े फेरबदल देखने को मिल सकते हैं। क्या AAP के कुछ विधायक भी इसी रास्ते पर चलेंगे? यह सवाल अब केजरीवाल की रातों की नींद उड़ाने के लिए काफी है। फिलहाल, राघव चड्ढा ने 'चेकमेट' कर दिया है और गेंद अब सत्ता के गलियारों में घूम रही है।
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