TTAADC चुनाव में Tipra Motha का जलवा, 28 में से 20 सीटों पर कब्जा
त्रिपुरा की राजनीति में एक बार फिर Tipra Motha पार्टी ने ऐसा तहलका मचाया है कि बाकी दल हक्का-बक्का रह गए हैं। त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज़ ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल यानी TTAADC के चुनाव में पार्टी ने 28 में से 20 सीटें जीतकर अपनी जबरदस्त पकड़ साबित कर दी है। राज्य निर्वाचन आयोग के मुताबिक अभी कुछ सीटों की गिनती बाकी है, लेकिन तस्वीर लगभग साफ हो चुकी है। यह जीत सिर्फ एक चुनावी नतीजा नहीं, बल्कि आदिवासी राजनीति में बदलते समीकरणों का साफ संकेत है।
Tipra Motha की यह लगातार दूसरी बड़ी जीत है, जो यह बताती है कि पार्टी का जनाधार अब और मजबूत हो चुका है। खास बात यह है कि यह पार्टी 2020 में बनी थी, लेकिन इतनी कम समय में इसने जिस तरह से अपनी पकड़ बनाई है, वह किसी ‘मास्टर प्लान’ से कम नहीं लगता।
ग्रेटर टिपरालैंड की मांग बनी जीत की असली ताकत
इस चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा रहा ‘ग्रेटर टिपरालैंड’। यही वो नारा है जिसने Tipra Motha को आदिवासी समुदाय के बीच हीरो बना दिया। पार्टी प्रमुख प्रद्योत देबबर्मा ने इस मुद्दे को सिर्फ चुनावी वादा नहीं, बल्कि पहचान और अधिकार की लड़ाई के रूप में पेश किया। इसका असर यह हुआ कि आदिवासी मतदाताओं ने खुलकर पार्टी का समर्थन किया।
त्रिपुरा का लगभग 70 प्रतिशत भू-भाग TTAADC के अधीन आता है और यहां करीब 15 लाख लोग रहते हैं। ऐसे में इस क्षेत्र में मजबूत पकड़ का मतलब है राज्य की राजनीति में बड़ी ताकत हासिल करना। Tipra Motha ने इस बात को अच्छे से समझा और उसी के अनुसार अपनी रणनीति तैयार की।
BJP को झटका, CPI(M)-कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला
जहां Tipra Motha जीत का जश्न मना रही है, वहीं बीजेपी के लिए यह नतीजा थोड़ा निराशाजनक रहा। पार्टी को अब तक सिर्फ तीन सीटों से संतोष करना पड़ा है। हालांकि बीजेपी और Tipra Motha राज्य में सहयोगी हैं, लेकिन चुनाव अलग-अलग लड़ने का फैसला बीजेपी पर भारी पड़ता दिखा।
सबसे ज्यादा झटका वामपंथी दल CPI(M) और कांग्रेस को लगा है। दोनों ही पार्टियां लगातार दूसरी बार एक भी सीट जीतने में नाकाम रही हैं। कभी त्रिपुरा की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाली CPI(M) के लिए यह किसी बड़े झटके से कम नहीं है। कांग्रेस की हालत भी कुछ ऐसी ही रही, जिससे साफ है कि आदिवासी इलाकों में उनकी पकड़ लगभग खत्म हो चुकी है।
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83% से ज्यादा वोटिंग, जनता ने दिखाया उत्साह
इस चुनाव में मतदाताओं का उत्साह भी देखने लायक था। 12 अप्रैल को हुए मतदान में 83.50 प्रतिशत वोटिंग दर्ज की गई, जो पिछले चुनाव से भी ज्यादा है। इतनी बड़ी संख्या में लोगों का मतदान करना यह दिखाता है कि जनता इस बार बदलाव या अपनी आवाज को मजबूत तरीके से सामने लाना चाहती थी।
कुल 173 उम्मीदवार मैदान में थे, लेकिन मुकाबला आखिरकार Tipra Motha और बीजेपी के बीच ही सिमट गया। जनता ने साफ तौर पर Tipra Motha को अपना भरोसा दिया।
देबबर्मा का संदेश प्यार ने नफरत को हराया
जीत के बाद पार्टी प्रमुख प्रद्योत देबबर्मा का बयान भी काफी चर्चा में है। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए कहा कि यह जीत जिम्मेदारी बढ़ाने वाली है। उनका कहना था कि “प्यार ने नफरत पर जीत हासिल की है” और अब सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों को समाज, राज्य और देश के लिए काम करना चाहिए।
उन्होंने खास तौर पर यह अपील भी की कि राज्य में शांति बनी रहनी चाहिए और आने वाली पीढ़ी के लिए बेहतर माहौल तैयार किया जाए। यह बयान बताता है कि पार्टी अब सिर्फ आंदोलन नहीं, बल्कि प्रशासनिक जिम्मेदारी को भी गंभीरता से लेने की कोशिश कर रही है।
BJP का बयान विकास बनाम भावना की लड़ाई
बीजेपी नेता और मंत्री रतन लाल नाथ ने हार स्वीकार करते हुए कहा कि अगर वोटर भावना में बहकर वोट करते हैं तो परिणाम ऐसे ही आते हैं। उनका संकेत साफ था कि Tipra Motha ने भावनात्मक मुद्दों पर चुनाव जीता, जबकि बीजेपी विकास के एजेंडे पर थी।
यह बयान राजनीतिक तौर पर काफी अहम है क्योंकि यह आने वाले समय में दोनों दलों के बीच रणनीति को प्रभावित कर सकता है। हालांकि दोनों पार्टियां सहयोगी हैं, लेकिन इस तरह के चुनावी नतीजे रिश्तों में हल्का तनाव भी ला सकते हैं।
2021 से 2026 Tipra Motha की तेजी से बढ़ती ताकत
अगर पिछले चुनावों से तुलना करें तो Tipra Motha की ताकत लगातार बढ़ रही है। 2021 में पार्टी ने 18 सीटें जीती थीं और करीब 46 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। अब यह आंकड़ा और ऊपर चला गया है, जो यह दिखाता है कि पार्टी ने अपनी पकड़ और मजबूत कर ली है।
दूसरी ओर बीजेपी का प्रदर्शन थोड़ा कमजोर हुआ है। पहले जहां उसे 9 सीटें मिली थीं, अब वह काफी पीछे रह गई है। यह बदलाव सिर्फ आंकड़ों का नहीं, बल्कि राजनीतिक जमीन खिसकने का संकेत भी है।
त्रिपुरा की राजनीति में नए समीकरण
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस जीत का आगे क्या असर होगा। Tipra Motha पहले ही ‘ग्रेटर टिपरालैंड’ की मांग को लेकर केंद्र सरकार पर दबाव बना रही है। इस जीत के बाद उसकी आवाज और तेज हो सकती है।
इसके अलावा राज्य की राजनीति में भी नए समीकरण बनने की संभावना है। बीजेपी और Tipra Motha के रिश्ते कैसे आगे बढ़ते हैं, यह देखने वाली बात होगी। अगर दोनों के बीच तालमेल सही रहता है तो सरकार के लिए काम करना आसान होगा, लेकिन अगर मतभेद बढ़ते हैं तो सियासी माहौल गरमा सकता है।
अगर इस पूरे चुनाव को एक लाइन में समझें तो जनता का संदेश बिल्कुल साफ है। आदिवासी समुदाय अब अपनी पहचान, अधिकार और भविष्य को लेकर ज्यादा सजग हो चुका है। वह सिर्फ वादों पर नहीं, बल्कि ठोस एजेंडे पर वोट कर रहा है।
मेरी नजर में यह चुनाव सिर्फ जीत-हार का खेल नहीं, बल्कि एक बड़े बदलाव की शुरुआत है। अगर Tipra Motha अपनी जिम्मेदारी को सही तरीके से निभाती है तो यह क्षेत्र के लिए नई दिशा तय कर सकती है। लेकिन अगर उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी, तो वही जनता अगले चुनाव में जवाब देने में देर नहीं करेगी।