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बंगाल-तमिलनाडु में वोटिंग का महा-रिकॉर्ड: आज़ादी के बाद पहली बार टूटा मतदान का आंकड़ा, दक्षिण दिनाजपुर में 95% पार

बंगाल-तमिलनाडु में वोटिंग का महा-रिकॉर्ड: आज़ादी के बाद पहली बार टूटा मतदान का आंकड़ा, दक्षिण दिनाजपुर में 95% पार

कोलकाता/चेन्नई: पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में लोकतंत्र का ऐसा उत्सव दिखा जिसने आज़ादी के बाद के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में गुरुवार को भारी गहमागहमी के बीच करीब 92.59% मतदान दर्ज किया गया, जो राज्य के चुनावी इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। इसी तरह तमिलनाडु ने भी 84.69% वोटिंग के साथ अपना ही पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया है। चुनाव आयोग ने मतदाताओं के इस जज्बे को सलाम करते हुए इसे भारतीय लोकतंत्र की बड़ी जीत बताया है।

Photo credit: Shashi Shekhar Kashyap
Photo credit : Shashi Shekhar Kashyap

 

 चौंकाने वाले हैं ये आंकड़े ?

दिलचस्प बात यह है कि बंगाल में यह बंपर वोटिंग तब हुई है जब चुनाव आयोग ने मतदाता सूची की विशेष जांच (SIR) के बाद करीब 91 लाख फर्जी  नाम हटा दिए थे। जानकारों का मानना है कि वोटर लिस्ट 'साफ' होने की वजह से वोटिंग प्रतिशत में यह भारी उछाल आया है। इससे पहले साल 2011 में, जब ममता बनर्जी ने लेफ्ट के 34 साल के शासन को उखाड़ फेंका था, तब 84.72% वोटिंग हुई थी। इस बार पहले ही चरण में उस रिकॉर्ड का भी 'धुआं' निकल गया।

प्रमुख जिलों का हाल कहां कितनी पड़ी वोट ?

बंगाल के कई जिलों में तो आंकड़ा 90% के काफी ऊपर निकल गया। दक्षिण दिनाजपुर और कूचबिहार जैसे इलाकों में मतदाताओं ने गजब का उत्साह दिखाया।

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कोलकाता और आसपास के इलाकों में जहां 2021 में करीब 82% वोटिंग हुई थी, वहीं इस बार मतदाताओं की लंबी कतारों ने राजनीतिक पंडितों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

SIR का असर 91 लाख नाम हटे, फिर भी बढ़ा ग्राफ

इस चुनाव की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि वोटिंग प्रतिशत तब बढ़ा है, जब बंगाल की मतदाता सूची में बड़ा 'ऑपरेशन' किया गया था। चुनाव आयोग के विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision - SIR) के तहत राज्य की वोटर लिस्ट से करीब 91 लाख नाम हटा दिए गए थे। इनमें वे लोग थे जो या तो मर चुके थे, शिफ्ट हो गए थे या जिनके नाम फर्जी तरीके से जुड़े थे।

इस छंटनी की वजह से बंगाल का कुल मतदाता आधार 7.6 करोड़ से घटकर 6.8 करोड़ रह गया। जानकारों का कहना है कि लिस्ट 'साफ' होने की वजह से डेटा में यह उछाल दिख रहा है। जब लिस्ट में केवल सक्रिय मतदाता बचे, तो मतदान का प्रतिशत स्वाभाविक रूप से ऊपर चला गया। हालांकि, जमीनी स्तर पर मतदाताओं का उत्साह भी कम नहीं था।

किसका पलड़ा भारी ?

भारी मतदान को लेकर तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भाजपा दोनों अपनी-अपनी जीत के दावे कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हुंकार भरते हुए कहा कि "पहले चरण में ही हमने जीत तय कर ली है," वहीं सुवेंदु अधिकारी ने दावा किया कि भाजपा 152 में से 125 सीटें जीत रही है।

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आमतौर पर माना जाता है कि जब वोटिंग प्रतिशत में इतना बड़ा उछाल आता है, तो यह 'सत्ता विरोधी लहर' (Anti-incumbency) या फिर 'बदलाव' का संकेत होता है। हालांकि, बंगाल के मामले में बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों का घर लौटना भी एक बड़ा फैक्टर रहा। लोग इस डर से भी वोट डालने पहुंचे कि कहीं भविष्य में उनका नाम वोटर लिस्ट से पूरी तरह न कट जाए।

 हिंसा, पर सुरक्षा सख्त

इतने भारी मतदान के बीच हिंसा की कुछ खबरें भी आईं। मुर्शिदाबाद में टीएमसी कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच झड़प हुई, वहीं दक्षिण दिनाजपुर में भाजपा उम्मीदवार सुभेंदु सरकार के साथ मारपीट की घटना सामने आई। इसके बावजूद, चुनाव आयोग ने मुस्तैदी दिखाते हुए प्रक्रिया को रुकने नहीं दिया। अब सबकी नजरें 29 अप्रैल को होने वाले दूसरे चरण और 4 मई को आने वाले नतीजों पर टिकी हैं।

Admin Desk

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